महावीर सांगलीकर
जैन समाज के भीतर जो सबसे बड़ा और दुर्भाग्यपूर्ण सच है, वह यह है कि दिगंबर और श्वेतांबर संप्रदाय आज भी आप सी विवाद, नफ़रत और मनमुटाव में उलझे हुए हैं. यह झगड़ा नया नहीं है, लेकिन समय के साथ इसका स्वरूप और भी संकीर्ण होता चला गया है. तीर्थक्षेत्रों की मालकियत किसकी है, किस पद्धति से मूर्ति की पूजा होनी चाहिए, वस्त्रधारण को लेकर क्या सही है, कर्मकांड किस रूप में हों — इन मुद्दों पर बहस नहीं, बल्कि टकराव है. और इस टकराव में सबसे ज्यादा नुकसान पूरे जैन समाज का हो रहा है.
दिगंबर और श्वेतांबर समाज का अधिकांश धन, दान और समय नए-नए मंदिरों के निर्माण, भव्य मूर्तियों, जटिल कर्मकांडों, उत्सवों और आडंबरों में खर्च हो रहा है. एक ही शहर में कई-कई मंदिर, एक ही तीर्थ पर वर्चस्व की लड़ाई, और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति. धर्म साधना का स्थान अब प्रदर्शन ने ले लिया है. आस्था कम और अहंकार ज्यादा दिखाई देता है. यह सब करते-करते समाज यह भूल गया कि धर्म का उद्देश्य आत्मशुद्धि और समाजहित होता है, न कि सत्ता और संपत्ति.
स्थानकवासी समाज
इसी दौरान स्थानकवासी संप्रदाय ने एक बिल्कुल अलग दिशा चुनी. उन्होंने कर्मकांड और मूर्तिपूजा को नकारा, जिससे उनका समय और ऊर्जा बची. यह बचा हुआ समय और धन उन्होंने शिक्षा, समाज सेवा और संगठन निर्माण में लगाया. स्कूल, कॉलेज, हॉस्टल, छात्रवृत्तियां, चिकित्सा सहायता, सामाजिक संस्थाएं — इन सबके पीछे स्थानकवासी समाज का बड़ा योगदान रहा है. जरूरतमंदों की मदद, व्यापारिक नैतिकता, अनुशासन और सामूहिक सोच ने इस समाज को मजबूत बनाया.
स्थानक वासी जैन मुनियों के प्रवचन भी आगम , आत्मज्ञान, व्यक्तिगत विकास, सामाजिक विकास, शिक्षा आदि से संबंधित होते है, न कि कर्मकांड, मूर्तिपूजा और मंदिर निर्माण के बारे में.
स्थानकवासी समाज केवल अपने विकास तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जैन एकता का भी लगातार पक्षधर रहा है. जैन समाज एक हो, आपसी मतभेद कम हों, और समाज की सामूहिक शक्ति बढ़े — इस दिशा में उन्होंने प्रयास किए. इसके विपरीत दिगंबर और श्वेतांबर समाज में आज भी एक-दूसरे के प्रति अविश्वास और उपेक्षा दिखाई देती है. जैन एकता उनके लिए न प्राथमिकता है और न ही आवश्यकता.
परिणाम आज सबके सामने है. शिक्षा के क्षेत्र में स्थानकवासी समाज बहुत आगे है. समाज सेवा, राजनीति, व्यापार, प्रशासन और अन्य क्षेत्रों में उनकी उपस्थिति मजबूत और प्रभावी है. अनुशासन, सरल जीवनशैली और व्यावहारिक सोच ने उन्हें प्रतिस्पर्धी दुनिया में आगे बढ़ने की क्षमता दी है. दूसरी ओर दिगंबर और श्वेतांबर समाज आज भी कर्मकांड, मूर्तिपूजा और आपसी विरोध के चक्र में फंसा हुआ है. वे यह तय करने में ही लगे हैं कि सही कौन है और गलत कौन, जबकि समय उनसे आगे निकल चुका है.
आत्म मंथन जरुरी
यह केवल संप्रदायों की तुलना का प्रश्न नहीं है, बल्कि सोच की दिशा का प्रश्न है. जो समाज भविष्य की तैयारी करता है, वही आगे बढ़ता है. जो समाज अतीत की लड़ाइयों में उलझा रहता है, वह पीछे रह जाता है. धर्म यदि विवेक, शिक्षा और करुणा नहीं पैदा कर रहा, तो वह केवल परंपरा बनकर रह जाता है.
आज जरूरत इस बात की है कि दिगंबर और श्वेतांबर समाज आत्ममंथन करें. यह समझें कि मंदिरों की संख्या बढ़ाने से समाज नहीं बढ़ता, बल्कि शिक्षित, आत्मनिर्भर और जागरूक व्यक्ति समाज को आगे ले जाते हैं. आडंबर कम हो, अहंकार टूटे, और ऊर्जा समाज निर्माण में लगे. नहीं तो इतिहास यही लिखेगा कि तुम आपस में झगड़ते रहे, और जो समय की समझ रखते थे, वे आगे निकल गए.
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