संजय सोनवणी
साल 1893 में अमेरिका के शिकागो शहर में आयोजित विश्व धर्म संसद उन्नीसवीं सदी की एक ऐतिहासिक घटना थी. दुनिया के अलग-अलग धर्मों के विद्वान और धर्मगुरु यहां इस उद्देश्य से इकट्ठा हुए थे कि धर्मों के बीच फैली अज्ञानता, गलतफहमी, अहंकार और नफरत को कम किया जा सके और इंसानों के बीच आपसी भाईचारा बढ़े.
इसी संसद में बॅरिस्टर वीरचंद राघवजी गांधी को जैन धर्म के प्रतिनिधि के रूप में बुलाया गया था. वे उस समय बहुत युवा थे, लेकिन ज्ञान, समझ और दृष्टि में बड़े-बड़े विद्वानों के बराबर थे.
हालांकि संसद का उद्देश्य सकारात्मक था, फिर भी कुछ वक्ताओं ने इस मंच का उपयोग हिंदू धर्म की आलोचना के लिए किया. स्वामी विवेकानंद का भाषण पहले ही हो चुका था. इसके बाद 25 सितंबर 1893 को जब वीरचंद गांधी मंच पर आए, तो उन्होंने सीधे जैन धर्म पर बोलने के बजाय पहले हिंदू धर्म पर की जा रही आलोचनाओं का शांत, तर्कपूर्ण और सम्मानजनक जवाब दिया. उनकी भाषा में न कटुता थी, न आक्रोश. बस तथ्य, तर्क और इंसानियत. उनके विचारों से पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा और आलोचक निरुत्तर हो गए.
विश्व धर्म संसद के मुख्य आयोजक रेवरेंड जॉन हेनरी बॅरोज ने खुले तौर पर स्वीकार किया कि वीरचंद गांधी ने संसद को उसके असली उद्देश्य—धर्मों के बीच सम्मान और समझ—की ओर वापस मोड़ दिया. वे वीरचंद गांधी की मानवीय सोच से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उनका भाषण अपने परिचय के साथ प्रकाशित किया और उन्हें संसद के समापन सत्र में फिर से बोलने के लिए आमंत्रित किया.
इस भाषण के बाद वीरचंद गांधी को अमेरिका के कई शहरों में व्याख्यान देने के निमंत्रण मिलने लगे. उनके विचारों से लोगों में जैन दर्शन, अहिंसा, अनेक दृष्टिकोणों को स्वीकार करने और नैतिक जीवन के प्रति गहरी रुचि पैदा हुई. कुछ लोगों ने तो जैन मूल्यों को अपने जीवन में अपनाने की कोशिश भी की.
जब वीरचंद गांधी ने शिकागो में यह ऐतिहासिक भाषण दिया, तब उनकी उम्र केवल 29 वर्ष थी. उनका जन्म 25 अगस्त 1864 को गुजरात के महुआ गांव में हुआ था. वे भारत के पहले जैन बैरिस्टर थे और 14 भाषाओं के जानकार थे. उन्होंने जैन धर्म के साथ-साथ हिंदू, बौद्ध, ईसाई और अन्य दार्शनिक परंपराओं का गहन अध्ययन किया था, वह भी मूल ग्रंथों के आधार पर.
उनकी सोच की जड़ें जैन धर्म के प्रमुख सिद्धांतों—अनेकांतवाद और अहिंसा—में थीं. यही कारण था कि वे दूसरे धर्मों को समझने, उनका सम्मान करने और जरूरत पड़ने पर तार्किक ढंग से बात रखने में सक्षम थे. वे खुद जैन थे, लेकिन जब हिंदू धर्म पर अनुचित हमले हुए, तो उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ उसका बचाव किया. इसी संतुलित दृष्टि के कारण उनकी मित्रता स्वामी विवेकानंद से हुई और बाद में महात्मा गांधी भी उनके विचारों से प्रभावित हुए.
वीरचंद गांधी को ईसा मसीह के जीवन में भी गहरी रुचि थी. उन्होंने कुछ प्राचीन पांडुलिपियों का अध्ययन किया, जिनमें यह संकेत मिलता है कि ईसा मसीह भारत आए हो सकते हैं. उन्होंने जैन धर्म और ईसाई धर्म के बीच दार्शनिक समानताओं पर भी गंभीर विचार किया, जिससे विद्वानों के बीच कई महत्वपूर्ण चर्चाएं शुरू हुईं.
धार्मिक और दार्शनिक चिंतन के साथ-साथ वे महिला शिक्षा, सामाजिक सुधार और भारत की स्वतंत्रता आंदोलन के भी समर्थक थे. वे मानते थे कि सच्चा धर्म वही है जो इंसान को बेहतर बनाए और समाज को आगे बढ़ाए.
सिर्फ 37 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है. उनके विचार, लेखन और जीवन पर आधारित नाटक “Gandhi Before Gandhi” जैसे मंचन आज भी लोगों को प्रेरित करते हैं. उनके अंतरधार्मिक योगदान के सम्मान में शिकागो में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई, जो आज भी उनकी स्मृति का प्रतीक है.
बॅरिस्टर वीरचंद गांधी हमें यह सिखाते हैं कि सच्ची धार्मिकता किसी एक धर्म को श्रेष्ठ साबित करने में नहीं, बल्कि सभी धर्मों के बीच समझ, सम्मान और संवाद बनाने में है. वे आज भी मानवता, बौद्धिक ईमानदारी और धर्मों के बीच सेतु बनने के प्रतीक हैं.
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संजय सोनवणी एक विख्यात इतिहासकार, खोजकर्ता, लेखक, वक्ता और जैन और हिन्दू धर्म के विद्वान है. उन्होंने विभिन्न विषयों पर मराठी, अंग्रेजी और हिंदी में 130 से पुस्तकें लिखी है.
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