विठ्ठल साठे
प्राचीन काल में एशिया महाद्वीप में भारत एक बहुत ही समृद्ध और संस्कारों वाला देश था. भारत में जैन, वैदिक और बौद्ध परंपराएं खास तौर पर जानी जाती थीं. इन तीनों परंपराओं में जैन परंपरा सबसे ज़्यादा प्राचीन है. जैन परंपरा को श्रमण परंपरा के नाम से भी पहचाना जाता था.
जैन श्रमण परंपरा, वैदिक और बौद्ध—दोनों परंपराओं से भी पहले की है. इसके बावजूद लंबे समय तक यह गलत सोच बनी रही कि जैन परंपरा वैदिक परंपरा की ही एक शाखा है. इतना ही नहीं, कई जगहों पर भगवान महावीर और गौतम बुद्ध को एक ही मान लिया जाता है, जबकि यह पूरी तरह गलत है.
इस विषय पर कई विद्वानों ने गहरा शोध किया है. खुदाइयों में मिली चीजें, अलग-अलग जगहों पर मिले शिलालेख, मूर्तियां और प्राचीन ग्रंथ—इन सबके आधार पर यह साफ़ हो चुका है कि जैन धर्म भारत का सबसे प्राचीन धर्म है.
ईरान का राजकुमार आर्द्रक
प्राचीन समय में जैन धर्म का प्रचार-प्रसार भारत की सरहदों से बाहर, ईरान तक पहुंच चुका था. इसका एक पक्का उदाहरण मिलता है. ईरान में आर्द्रक नाम का एक राजकुमार था, जो भगवान महावीर का शिष्य बन गया था. उस समय मगध के राजा श्रेणिक का बेटा अभयकुमार था. आर्द्रक के पिता ने राजा श्रेणिक को कुछ भेंट-उपहार भेजे थे. उसी तरह आर्द्रक राजकुमार ने भी अभयकुमार को उपहार भेजे थे.
ईरान (कुछ विद्वानों के मुताबिक इराक) के राजा और राजकुमार की तरफ़ से भेजे गए उपहारों के जवाब में अभयकुमार ने भी आर्द्रक को उपहार भेजे. ये उपहार जैन धर्म से जुड़े हुए थे. उन्हें देखकर आर्द्रक राजकुमार के दिल में भगवान महावीर के दर्शन करने की चाह पैदा हुई. इसी चाह में वह भारत आया और भगवान महावीर से मिलने पहुंचा.
भारत आने के बाद आर्द्रक राजकुमार की मुलाकात गोशालक से हुई. गोशालक पहले भगवान महावीर का अनुयायी था, लेकिन बाद में उसने अपना अलग पंथ बना लिया और वह नियतिवादी बन गया. उसने आर्द्रक को समझाने की कोशिश की कि भगवान महावीर की सोच गलत है.
लेकिन आर्द्रक राजकुमार ने बड़े सुकून और संयम के साथ समझाया कि भगवान महावीर की सोच क्यों सही है और कैसे वह पूरी दुनिया के भले के लिए ज़रूरी है. आर्द्रक की साफ़ और मजबूत बातों के सामने गोशालक को पीछे हटना पड़ा.
आर्द्रक राजकुमार की मुलाकात कुछ वैदिक सोच को मानने वालों से भी हुई. उन्होंने भी महावीर की शिक्षाओं को गलत साबित करने की कोशिश की. लेकिन आर्द्रक ने उन्हें भी समझा दिया कि भगवान महावीर की सोच सच्ची और इंसानियत के लिए फ़ायदेमंद है.
आख़िरकार आर्द्रक राजकुमार ने भगवान महावीर से दीक्षा ली और वह मुनि बन गया.
इस पूरी कहानी से यह साफ़ होता है कि प्राचीन ज़माने में जैन धर्म भारत की सरहदों को पार करके विदेशों तक पहुंच चुका था. जैन धर्म की शिक्षाएं और उसका दर्शन दूसरे देशों के लोगों को भी अपनी ओर खींचता था. इसी वजह से वे भारत आते थे, जैन धर्म को समझते थे और उसके सिद्धांत अपनाते थे.
यह उदाहरण सिर्फ़ ईरान तक सीमित नहीं है. प्राचीन काल में जैन धर्म नेपाल, श्रीलंका, वियतनाम, ईरान, अरब देशों जैसे कई इलाकों तक फैल चुका था.
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श्री विठ्ठल साठे मराठी के एक विख्यात लेखक, समाजसुधारक, मातंग समाज की जैन धर्म में घरवापसी आंदोलन के नेता, जैन विचार मंच के निमंत्रक और श्री सुपार्श्वनाथ अहिंसा चैरिटेबल ट्रस्ट, सातारा के अध्यक्ष है.
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पहले शास्त्रों में जैन कहानी मिलती थी आजकल जैन शास्त्र कोई पढ़ना नहीं इसलिए जैन जितनी भी कहानी है सच्ची कहानी जैन धर्म की वह आपको एक किताब में लिखकर किताब का प्रचारित करना चाहिए ताकि हमारे बच्चे लोग भी पड़े स्कूल में भी पढ़ाई जानी चाहिए