दान, अहंकार और जैन समाज की बदलती मानसिकता

नितिन जैन

पलवल (हरियाणा)
मोबाइल: 9215635871

आगम प्रमाण सहित एक आत्ममंथन

दान का वास्तविक अर्थ है – स्वामित्व का पूर्ण त्याग. जिस वस्तु पर हमारा अधिकार था, उसे बिना किसी अपेक्षा, बिना किसी प्रसिद्धि की इच्छा के छोड़ देना ही दान है. परंतु आज समाज में एक विचित्र प्रवृत्ति दिखाई देती है – दान की वस्तु पर दाता का नाम मोटे अक्षरों में अंकित हो, यह आग्रह रहता है. यदि नाम छूट जाए तो असंतोष उत्पन्न होता है. प्रश्न यह है कि क्या यह दान है या दान के माध्यम से प्रतिष्ठा अर्जित करने का साधन? इस विषय को जैन आगमों के आलोक में समझना आवश्यक है.

तत्त्वार्थसूत्र में आचार्य उमास्वाति ने कहा है – “दानं परोपकारार्थम्” अर्थात् दान परोपकार के लिए है, न कि आत्मप्रदर्शन के लिए. तत्त्वार्थसूत्र (७.३३) में दान को चार प्रकारों में बताया गया है – आहारदान, औषधदान, ज्ञानदान और अभयदान. इनका उद्देश्य जीवों की पीड़ा हरना और आत्मा की निर्मलता बढ़ाना है. कहीं भी नाम-प्रसिद्धि का उल्लेख नहीं है.

उत्तराध्ययन सूत्र में दान की भावना पर एक गाथा आती है –
“दाणं भोगो न संचयो, संचयो दुःखकारणं.
दाणेण पव्वयं पुण्णं, संचयेण भवो भवो.”

अर्थात् धन का सदुपयोग दान और भोग है, संचय दुःख का कारण है. दान से पुण्य की प्राप्ति होती है, संचय से जन्म-मरण का चक्र चलता रहता है. यहां स्पष्ट है कि दान त्याग की भावना से हो; यदि संचय की मानसिकता (यानी नाम, यश, प्रतिष्ठा का संचय) जुड़ जाए तो दान की आत्मा क्षीण हो जाती है.

दशवैकालिक सूत्र में कहा गया है –
“दत्ता हु दाणं भणियं, जं दिज्जइ अणुप्पहं.
न तस्स होइ संलेओ, जं दत्तं तं परिग्गहो.”

अर्थ – वही दान कहलाता है जो बिना आसक्ति के दिया जाए. यदि देने के बाद भी मन में ‘यह मेरा है’ का भाव रहे, तो वह परिग्रह (संग्रह) ही है. जब दान की वस्तु पर अपना नाम प्रमुखता से अंकित करवा कर स्वामित्व की स्मृति बनाए रखते हैं, तब सूक्ष्म परिग्रह बना रहता है.

आचारांग सूत्र में अपरिग्रह को साधु और श्रावक दोनों के लिए महत्त्वपूर्ण बताया गया है –
“परिग्गहेण दुःखं, अप्परिग्गहेण सुखं.”

परिग्रह से दुःख और अपरिग्रह से सुख की प्राप्ति होती है. यदि दान भी परिग्रह-वृत्ति को पोषित करे, तो वह आध्यात्मिक उन्नति का साधन कैसे बनेगा?

दान का आदर्श स्वरूप

जैन दर्शन में भावना की प्रधानता है. यदि दान प्रेरणा हेतु नाम सहित हो, तो भी वह विनम्र और गौण होना चाहिए. प्रमुख स्थान पर तो केवल जिनेन्द्र भगवान का नाम शोभा देता है. दानदाता का नाम यदि दान से बड़ा हो जाए तो यह संकेत है कि त्याग से अधिक प्रदर्शन महत्त्वपूर्ण हो गया है.

आज जैन समाज आर्थिक रूप से समृद्ध है. मंदिर भव्य बन रहे हैं, प्रतिष्ठाएं विशाल स्तर पर हो रही हैं, चातुर्मास में बड़े आयोजन हो रहे हैं. परंतु आत्ममंथन का विषय यह है कि क्या हमारी विनम्रता भी उतनी ही बढ़ रही है? क्या हम दान देकर भीतर से हल्के हो रहे हैं या समाज में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा कर अहंकार को पुष्ट कर रहे हैं?

दान का आदर्श स्वरूप वह है जिसमें दाता स्वयं को केवल निमित्त माने. कर्म सिद्धांत के अनुसार पुण्य का लेखा पत्थर की पट्टिका पर नहीं, आत्मा की सूक्ष्म परिणति में दर्ज होता है. यदि दान के साथ अहंकार जुड़ गया तो वह पुण्य को क्षीण कर सकता है.

समय की आवश्यकता है कि जैन समाज दान की परिभाषा को पुनः समझे. दान आत्मशुद्धि का साधन है, सामाजिक प्रतिस्पर्धा का नहीं. यदि नाम लिखवाना आवश्यक भी हो तो वह विनम्रता के साथ हो, प्रदर्शन के साथ नहीं. सच्चा दान वही है जिसमें दान की वस्तु के साथ-साथ अहंकार भी समर्पित कर दिया जाए. तभी दान आत्मा को मुक्त करेगा और समाज को भी शुद्ध प्रेरणा देगा.

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