धर्म के नाम पर धोखा: बाहरी तपस्या की कड़वी सच्चाई

बाहरी तपस्या की कड़वी सच्चाई

अशोक डी. कोठारी

आज मैं तप और तपस्या के विषय पर एक बहुत ज़रूरी बात आप सबके सामने रखना चाहता हूं. खास तौर पर बाहरी तपस्या को लेकर कुछ गंभीर सवाल हैं, जिन पर हमें पूरी ईमानदारी से विचार करना चाहिए. सबसे पहला और सबसे अहम प्रश्न यही है कि हम तपस्या क्यों करते हैं, तपस्या से हम क्या पाना चाहते हैं, और जो हम पाना चाहते हैं, क्या वह वास्तव में हमें मिल भी रहा है.

तपस्या का असली उद्देश्य क्या है?

तपस्या का मूल उद्देश्य आत्मा पर जमे हुए कर्मों के आवरण को कम करना है. ये आवरण क्रोध, मान, माया, लोभ और इनके साथ जुड़े राग-द्वेष हैं. जब ये कषाय कम होते हैं, तभी आत्मा शुद्ध होती है और हम विशुद्धि की ओर बढ़ते हैं. लेकिन आज हमें खुद से यह पूछना होगा कि क्या हमारी तपस्या से सच में ये कषाय कम हो रहे हैं, या फिर अनजाने में हम इन्हें और बढ़ा रहे हैं.

यह बात सुनकर शायद आपको आश्चर्य हो, लेकिन सच्चाई यह है कि भगवान आदिनाथ से लेकर भगवान महावीर स्वामी तक, किसी भी तीर्थंकर ने बाहरी तपस्या नहीं की. हमें बाहर से देखने पर लगता है कि भगवान महावीर ने छह महीने, नौ महीने या कई महीनों के उपवास किए. लेकिन यह केवल व्यवहारिक दृष्टि से दिखाई देता है. निश्चय दृष्टि से भगवान कोई तपस्या नहीं कर रहे थे. वे तो केवल ज्ञाता और दृष्टा थे. उनके जीवन में जो कुछ भी घट रहा था, वह उनके पूर्व जन्मों के उदय कर्मों के अनुसार स्वाभाविक रूप से घट रहा था. जब भोजन मिला, तो उन्होंने भोजन किया. जब भोजन नहीं मिला, तो नहीं किया. इसमें कोई संकल्प, कोई तप का भाव और कोई अहंकार नहीं था कि मैं तप कर रहा हूं.

कर्म का नियम: क्रिया और प्रतिक्रिया

कर्म के नियम को समझने के लिए एक उदाहरण बहुत स्पष्ट है. पूर्व जन्म में भगवान महावीर का जीव एक राजा था और एक ग्वाला उसका सेवक था. किसी भूल के कारण राजा ने उस सेवक के कानों में पिघला हुआ शीशा डलवा दिया. उसी कर्म के फलस्वरूप अंतिम जन्म में वही जीव, जिसने सेवक के रूप में पीड़ा पाई थी, भगवान महावीर के कानों में कीलें ठोकता है. यह सब पुराने कर्मों की प्रतिक्रिया थी. भगवान इसमें कर्ता नहीं थे, वे केवल साक्षी थे. इसी कारण उनके नए कर्म नहीं बंधे और पुराने कर्म निर्जरा होकर समाप्त होते चले गए. जब सारे कर्म समाप्त हो गए, तभी उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति हुई.

अब ज़रा हम अपनी ओर देखें. अगर किसी से पूछा जाए कि आप तपस्या क्यों कर रहे हैं, तो सामान्य उत्तर यही होता है कि हम निर्जरा के लिए, आत्म-कल्याण के लिए और पाप कर्मों को नष्ट करने के लिए तपस्या कर रहे हैं. लेकिन जब यही सवाल दिल पर हाथ रखकर और पूरी सच्चाई के साथ पूछा गया, तो लगभग 95 प्रतिशत लोगों ने यह स्वीकार किया कि वे तपस्या देखादेखी कर रहे हैं. उन्हें भी वही मान-सम्मान और वही यश-कीर्ति चाहिए, जो लंबे उपवास करने वालों को मिलता है. इस तरह तपस्या का असली उद्देश्य आत्म-शुद्धि नहीं रह जाता, बल्कि मान, प्रतिष्ठा और समाज में नाम बन जाता है.

कुछ साधु-संत भी ….

यहां तक कि कुछ साधु-संत भी तप से पहले ऐसी जड़ी-बूटियों का उपयोग करते हैं, जिससे भूख और प्यास की पीड़ा महसूस ही न हो. अब हमें खुद सोचना चाहिए कि अगर भूख ही नहीं लग रही और शरीर को कोई कष्ट ही नहीं हो रहा, तो यह कैसी तपस्या हुई. असली तपस्या वही है, जिसमें जो भी कष्ट आए, चाहे वह भूख हो, प्यास हो, दर्द हो या परेशानी हो, उसे समता भाव से सहन किया जाए. वह तपस्या दिखावे के लिए नहीं, दबाव में नहीं और मान की चाह में नहीं होनी चाहिए.

भाव ही बंधन का कारण है

जैन धर्म बहुत स्पष्ट रूप से कहता है कि बंध क्रिया से नहीं, भाव से होता है. अगर बाहर से कोई उपवास कर रहा है, लेकिन अंदर भाव यह है कि मुझे मान चाहिए, सम्मान चाहिए और जय-जयकार चाहिए, तो उस व्यक्ति में मान नामक कषाय और अधिक बढ़ जाता है. जब मान नहीं मिलता, तो क्रोध आता है. फिर माया और कपट आते हैं और लोभ तो पहले से ही मौजूद रहता है. इस तरह तपस्या करने से चारों कषाय कम होने के बजाय और मजबूत हो जाते हैं.

यदि कथनी और करनी में फर्क है, तो ऐसी तपस्या व्यक्ति को अधोगति की ओर भी ले जा सकती है. और इसमें केवल तपस्या करने वाला ही नहीं, बल्कि उसकी अनुमोदना करने वाले भी भागीदार बनते हैं. इसमें घरवाले, रिश्तेदार, समाज, यहां तक कि साधु-संत और आचार्य भी शामिल हो सकते हैं. जो जितना अधिक इसमें शामिल है, उसे उतना ही फल मिलता है.

सही तपस्या का उद्देश्य केवल कषायों को कम करना, राग-द्वेष को घटाना और आत्म-शुद्धि व आत्म-कल्याण होना चाहिए. शरीर की शुद्धि के लिए अपनी शक्ति के अनुसार एक-दो दिन, पांच-दस दिन तक तप करना उचित है. महीने में एक-दो उपवास या एकासना करना शरीर और आत्मा के लिए पर्याप्त होता है.

अब फैसला हमारे हाथ में है. अगर उर्ध्व गति चाहिए, तो तपस्या सही भाव से करनी होगी और कथनी व करनी में समानता रखनी होगी. लेकिन अगर कथनी कुछ और है, करनी कुछ और है और अंदर का भाव कुछ और है, तो अधोगति से बचने का कोई रास्ता नहीं है. यह सच्चाई है. इसे समझना, अपनाना और अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना ही सच्ची धर्म-सेवा है, ताकि दिखावे की तपस्या से समाज को बचाया जा सके.

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