महावीर सांगलीकर
चतुर्थ समाज दिगंबर जैन समाज में जनसंख्या के हिसाब से सबसे बड़ा जाति-समूह है. पूरे जैन समाज में यह दूसरा सबसे बड़ा समूह है. संख्या के मामले में दिगंबरों में चतुर्थ समाज अग्रवाल और खंडेलवाल जैनों से आगे हैं, जबकि पूरे जैन समाज में ये ओसवालों के बाद आता है.
चतुर्थ नाम की उत्पत्ति
“चतुर्थ” संस्कृत का शब्द है, लेकिन यह इस समुदाय का मूल नाम नहीं है. पुराने दस्तावेजों, साहित्य, ताम्रपत्रों या शिलालेखों में यह नाम कहीं भी नहीं पाया जाता.
असल में “चतुर्थ” शब्द “क्षत्रारु” इस कन्नड़ शब्द का बिगड़ा हुआ रूप है. क्षत्रारु शब्द संस्कृत के “क्षत्रिय” या प्राकृत के “छत्री/खत्री” का कन्नड़ रूप है. इस तरह स्पष्ट है कि चतुर्थ शब्द का मूल क्षत्रिय इस शब्द में है.
(क्षत्रिय → क्षत्रारु → छत्तर → चतर → चतुर्थ)
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि चतुर्थ परंपरागत रूप से खुद को क्षत्रिय मानते आए हैं.
कोंकणी भाषा में क्षत्रियों को “चार्दो” कहा जाता है. गोवा में चार्दो नाम का समुदाय है, और कुछ विद्वानों के अनुसार चतुर्थ और चार्दो एकही लोग हैं.
आम तौर पर चतुर्थों को “जैन” के रूप में पहचाना जाता है, न कि चतुर्थ नाम से.
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
चतुर्थ कई सदियों से दक्षिण महाराष्ट्र और उत्तर कर्नाटक में रहते आए हैं. नांदणी (जिला कोल्हापुर, महाराष्ट्र ) का जिनसेन जैन मठ चतुर्थों से जुड़ा है. इस मठ की स्थापना 10वीं सदी में आचार्य जिनसेन ने की थी, जो राष्ट्रकूट राजा अमोघवर्ष के गुरु थे.
दक्षिण महाराष्ट्र और उत्तर कर्नाटक इस क्षेत्र पर कदंब, राष्ट्रकूट, रट्ट, चालुक्य, कलचुरी और शिलाहार जैसे कई जैन राजवंशों का शासन रहा.
हर चतुर्थ परिवार की वंशावली सुरक्षित रखी जाती है. यह काम “हेलवी” नाम का समुदाय करता है, जो दक्षिण महाराष्ट्र और उत्तर कर्नाटक के परिवारों की वंशावली संभालता है. हेलवियों के अनुसार कलचुरी वंश के जैन राजा बिज्जल ने उन्हें यह काम सौंपा था. इन वंशावलियों में आम तौर पर 25 से 40 पीढ़ियों का विवरण मिलता है.
चतुर्थों के कई कुलनाम (surnames) गांव की प्रशासनिक जिम्मेदारियों से जुड़े हैं. जैसे पाटिल (गांव का मुखिया), देसाई (कई गांवों का प्रमुख और कर वसूलने वाला), मगदूम (रिकॉर्ड रखने वाला), चौगुले (पाटिल का सहायक), खोत (गांव का मुखिया) आदि.
पाटिल पद मुस्लिम शासकों के समय प्रचलित हुआ. उससे पहले गौड़ा, गौंड, गोंडा, गौंडर जैसे शब्द गांव प्रमुख के लिए इस्तेमाल होते थे. ये शब्द आज भी चतुर्थों की वंशावलियों और नामों में मिलते हैं, और श्रवणबेलगोला के जैन शिलालेखों में भी पाए जाते हैं. शिलाहारों के समय गाउंड यह शब्द भी प्रचलित था.
चतुर्थों की वंशावलियों से पता चलता है कि इनका सबसे पुराने कुलनाम देसाई और पाटिल थे, और आज भी इस समाज में पाए जाते है.
चतुर्थों के पूर्वज रट्ट, शिलाहार, देवगिरी यादव, आदिलशाही और छत्रपति शिवाजी, संभाजी, राजाराम, ताराबाई और शाहू महाराज के समय में उच्च पदों पर प्रशासनिक अधिकारी और सैन्य अधिकारी रहे हैं.
भौगोलिक फैलाव

चतुर्थ मुख्य रूप से दक्षिण महाराष्ट्र और उत्तर कर्नाटक में बसे हुए हैं. खास तौर पर सांगली, कोल्हापुर, बेलगावी (बेलगाम), सोलापुर, हुबली और बीजापुर जिलों में इनकी बड़ी संख्या है. इसके अलावा पश्चिम महाराष्ट्र और मध्य कर्नाटक में भी ये पाए जाते हैं.
ये समुदाय सैकड़ों गांवों में फैला हुआ है. कई गांवों में इनकी आबादी 40 से 70 प्रतिशत तक है. ऐसे गांव आम तौर पर “जैन गांव” कहलाते हैं. इनमें से ज्यादातर गांव कृष्णा नदी घाटी में कृष्णा, वारणा, पंचगंगा, दूधगंगा, वेदगंगा, मलप्रभा जैसी नदियों के किनारे बसे हैं.
चतुर्थ और गौड़ा
दक्षिण कर्नाटक में खेती करने वाला एक बड़ा समुदाय गौड़ा कहलाता है. गौड़ा और चतुर्थों में कई समानताएं हैं. पहले अधिकतर गौड़ा जैन थे. आज भी कई गौड़ा जैन हैं या शुद्ध शाकाहारी हैं. कई गौड़ा समुदाय फिर से जैन धर्म अपना रहे हैं.
गौड़ाओं का सीधा संबंध गंग वंश से और श्रवणबेलगोल इस जैन तीर्थक्षेत्र से है, और चतुर्थ समाज में भी इस तीर्थक्षेत्र का बड़ा महत्त्व है. गंगवंशीय राजा जैन धर्म के अनुयायी थे.
एक विशेष बात यह है कि श्रवणबेलगोल की भगवान बाहुबली की विशाल मूर्ति का निर्माण गंग वंशीय राजा मारसिंह के सेनापति चावुंडराय ने किया था, और यह चावुंडराय उत्तरी कर्नाटक से थे.

गौड़ा समुदाय में नाम के साथ “गौड़ा” जोड़ा जाता है. चतुर्थों की वंशावलियों में भी गौड़ा, गौंड, गोंडा जैसे शब्द मिलते हैं.
उदाहरण में, सांगली के पास समडोळी गांव के एक चतुर्थ परिवार की 25 पीढ़ियों की वंशावली में 60 में से 50 नामों के साथ गौड़ा या उसके रूप जुड़े हैं, जैसे गोंडा, गौंडा आदि.
दक्षिण कर्नाटक के गौड़ा को वोक्कालिगा गौड़ा कहा जाता है, और चतुर्थों को भी सौ साल पहले तक वोक्कालिगा कहा जाता था. दोनों समुदाय खेती करने वाले, मूल रूप से कन्नड़ भाषी, गांव प्रशासन में ऊंचे पदों पर रहने वाले और शारीरिक बनावट में भी मिलते-जुलते हैं.
केरल के वायनाड जिले के जैनों को भी “गौडर” कहा जाता है, और उनके वैवाहिक संबंध दक्षिण कर्नाटक के जैन गौडा समाज से हैं.
इससे साफ होता है कि गौड़ा और चतुर्थ एक ही मूल के लोग हैं, गौड़ा उत्तर कर्नाटक के गौड़ा चतुर्थ नाम से जाने जाने लगे. .
चतुर्थ समाज का स्थलांतर
चतुर्थ समाज के बड़े स्थलांतर भी हो गए हैं, जैसे: .
- कर्नाटक के मूडबिद्री क्षेत्र में जैन धर्म के पतन के बाद वहां से उत्तर कर्नाटक की ओर चतुर्थों का स्थलांतर हुआ. वे कृष्णा और उसकी सहायक नदियों के किनारे बस गए.
- 13वीं सदी के एक शिलालेख के अनुसार कोल्हापुर के शिलाहार सेनापति निम्बरस ने जैनियों को बुलाकर कोल्हापूर के आसपास कई गांव बसाए. यह भी एक बड़ा सामूहिक स्थलांतर था.
- कलचुरी राजा बिज्जल की हत्या के बाद जैनों और वीरशैवों में संघर्ष हुआ. उस समय कई चतुर्थ जैन परिवार दक्षिण महाराष्ट्र और उत्तर कर्नाटक की ओर चले गए.
- चतुर्थों की वंशावलियां देखने पर पता चलता है कि विजय नगर साम्राज्य का पतन होने के बाद और आदिलशाह के साथ संघर्ष के कारण कई चतुर्थ परिवार बीजापुर जिले के सालबिद्री और तालिकोटा एरिया से बेलगाव, कोल्हापुर और सांगली की तरफ आकर बस गए.
- बीसवीं सदी से चतुर्थ समाज के पढ़े लिखे युवक-युवतियों का स्थलांतर पुणे, मुंबई, ठाणे, नासिक, औरंगाबाद, गोवा, बेंगलुरु जैसे शहरों और हो रहा है, और कई चतुर्थ विदेशों तक पहुंच गए हैं.
चतुर्थ समाज का धर्म और धार्मिक परिवर्तन
चतुर्थ समाज का एक बड़ा भाग जैन धर्म का अनुयायी हैं. दक्षिण भारत के पारंपरिक जैन दिगंबर होते हैं, इसलिए यह चतुर्थ भी दिगंबर परंपरा के अनुयायी हैं. परंपरागत रूप से ये बीसपंथी दिगंबर रहे हैं और भट्टारक परंपरा में विश्वास रखते हैं. नांदणी मठ के जिनसेन भट्टारक इनके प्रमुख माने जाते हैं.
पिछले कुछ दशकों में कई चतुर्थ दिगंबर तेरापंथ की ओर भी आकर्षित हुए हैं.
लेकिन सारे चतुर्थ जैन धर्मीय नहीं है. चतुर्थों का एक बड़ा समूह वीरशैव लिंगायत है. इसी प्रकार गोवा में कई चतुर्थ ईसाई धर्म का पालन करते है, जो पोर्तुगीज काल में ईसाई हो गए थे. जैन, लिंगायत और ईसाई चतुर्थों का आपस में कोई सामजिक संबंध नहीं है, क्यों कि धर्म और संस्कृतियां अलग अलग है और एरिया भी अलग अलग होते है.
पिछले हजार सालों में कई चतुर्थ जैन परिवारों ने अन्य धर्म अपनाए. सबसे बड़ा परिवर्तन वीरशैव लिंगायत धर्म की ओर हुआ. उत्तर कर्नाटक और कोल्हापुर जिले के कुछ हिस्सों में चतुर्थ लिंगायत पाए जाते हैं. कई जैन और लिंगायत चतुर्थ परिवार एक ही पूर्वजों से जुड़े हैं, जिसकी पुष्टि वंशावलियों से होती है.
लिंगायत धर्म की स्थापना के बाद चतुर्थों के कई घरों में एक भाई जैन और एक भाई लिंगायत ऐसा भी होता था. जैन चतुर्थ और लिंगायत चतुर्थ में शादियां भी होती थी. लेकिन आगे चलकर धर्म के आधार पर चतुर्थों में पूरा सेपरेशन हो गया.
मध्यकाल में कुछ भट्टारकों द्वारा भारी धन वसूली के कारण कई जैन चतुर्थ परिवार जैन धर्म से अलग हो गए और लिंगायत बने.
पुर्तगाली काल में गोवा के लगभग सभी चार्दो (चतुर्थ) ईसाई बना दिए गए. आदिलशाही शासन में कुछ चतुर्थ परिवारों का इस्लाम में जबरन या लाभ के लिए धर्मांतरण हुआ.
चतुर्थ और पंचम, कासार, सैतवाल आदि
कुछ विद्वानों ने कहा कि दक्षिण भारत में पहले जैनों की एक ही जाति थी, पंचम, जो बाद में चतुर्थ, पंचम, कासार और सैतवाल में बंट गई. यह सिर्फ अनुमान है, इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है. इस विषय में ध्यान देने योग्य बातें यह है कि:
- सैतवाल जाती की उत्पत्ति राजस्थान से है, और उनका चतुर्थ-पंचम-कासार जातियों से जिनेटिक संबंध नहीं दिखता.
- वहीं कासारों की उत्पत्ति का पूरा इतिहास कालिका पुराण में मिलता है, जिससे दिखाई देता है की उनकी उत्पत्ति का पंचम जाति से कोई संबंध नहीं. (कासार समाज के बारे में विस्तार से पढ़िए: महाराष्ट्र का जैन कासार समाज )
- यह भी ध्यान देने योग्य है कि सैतवाल, कासार, चतुर्थ और पंचम इनके कुलनाम (सरनेमस) एक दूसरे से मेल नहीं खाते, और जानकार लोग कुलनाम देखकर ही बता सकता है कि कौन किस जाति से है.
- चतुर्थ और पंचम के कुछ कुलनाम मिलते-जुलते हैं, लेकिन ये कुलनाम पदनाम हैं, (जैसे की पाटिल, मगदुम, चौगुले आदि).
- वंशावलियों में इन चारों का मूल एक नहीं दिखाई देता.
सन्दर्भ ग्रन्थ :
- Jain Community: A Social Survey by Dr. Vilas Sangave
- People of India by K.S. Singh
- जैन आणि हिन्दू: तात्या केशव चोपडे
- कई चतुर्थ परिवारों की वंशावलियां
- Back to Jina by Dr. Bhuvanendra Kumar
- Kolhapur District Gazetteer 1884
- District Gazetteer of Belgaum
- District Gazetteer of Mysore
- Census of India reports 1881 to 2001
- All India Digambar Jain Directory 1914
- दक्षिण भारत जैन सभेचा इतिहास
- जैन शिलालेख संग्रह भाग 1
- History of Gounder community
- शिलाहार राजवंशाचा इतिहास: डॉ. वि वि मिराशी
- Canadian Studies in Jainism by Dr. Bhuvanendra Kumar
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