ध्यान किया नहीं जाता, हो जाता है!

ध्यान

अशोक डी. कोठारी

आजकल ध्यान शब्द बहुत प्रचलन में है. सोशल मीडिया, यूट्यूब, किताबें, कोर्स और रिट्रीट. हर जगह ध्यान सिखाने का दावा किया जा रहा है. कोई कहता है सुबह ध्यान करो, कोई कहता है रात को करो. कोई किसी विशेष चक्र पर ध्यान करने की बात करता है, तो कोई किसी विशेष केंद्र, मंत्र, प्रकाश, ध्वनि या सांस पर ध्यान लगाने को कहता है.

इतनी अधिक विधियों और निर्देशों के बीच एक बहुत ही मूल प्रश्न लगभग हमेशा अनदेखा रह जाता है…. जो हम कर रहे हैं, क्या वह वास्तव में ध्यान है या केवल मन की एकाग्रता.

अधिकांश लोग यह मान लेते हैं कि आंख बंद करके बैठ जाना, किसी वस्तु पर मन को टिकाना या विचारों को रोकने का प्रयास करना ही ध्यान है. लेकिन जैन दर्शन इस विषय को बहुत गहराई से देखता है. इस लेख में उसी गहराई से यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि ध्यान वास्तव में क्या है और क्या नहीं.

ध्यान क्या है

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ध्यान कोई क्रिया नहीं है जिसे किया जाए. ध्यान कोई अभ्यास नहीं है जिसे जब चाहें तब कर लिया जाए. ध्यान ज्ञान के परिणामस्वरूप स्वतः उत्पन्न होता है.

जिस विषय का जितना गहरा ज्ञान होता है, उसी विषय का उतना ही गहरा ध्यान अपने आप उत्पन्न हो जाता है. ध्यान का अर्थ है
ज्ञाता और ज्ञेय के संबंध से उत्पन्न अवस्था. इसे न तो जबरदस्ती किया जा सकता है और न ही करवाया जा सकता है.

मान लीजिए आपने दो महीने बाद की ट्रेन का टिकट ले लिया है. टिकट लेने के बाद आप अपने रोजमर्रा के काम में लग जाते हैं, किन यात्रा की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आती है, वह बात स्वतः आपके ध्यान में रहने लगती है. आप जबरदस्ती उस पर ध्यान नहीं करते, फिर भी वह बार-बार स्मरण में आती है. इसी प्रकार, ज्ञान जितना गहरा होगा, ध्यान उतना ही स्वतः उत्पन्न होगा.

ध्यान कैसे उत्पन्न होता है

जैन दर्शन में ध्यान को चार श्रेणियों में बांटा गया है: आर्त, रौद्र, धर्म और शुक्ल ध्यान. इन चारों को समझे बिना ध्यान की सही प्रकृति को नहीं समझा जा सकता.

यदि किसी ने आपको कोई कड़वी बात कह दी और आपको दुख हुआ, जलन हुई, पीड़ा हुई. यह सब आर्त ध्यान है. यह ध्यान इसलिए उत्पन्न हुआ क्योंकि आपको शब्दों का ज्ञान हुआ और उस ज्ञान से दुख पैदा हुआ.

अगर वही दुख सहन न हो पाया और आपने सामने वाले को पलटकर कठोर शब्द कह दिए, तो यह रौद्र ध्यान बन गया. इसमें व्यक्ति खुद भी दुखी होता है और दूसरे को भी दुखी करता है.

यदि व्यक्ति यह समझ ले कि जो कुछ भी घट रहा है वह मेरे ही कर्मों का फल है, और सामने वाला केवल निमित्त है, तो वह न प्रतिक्रिया करता है, न प्रतिशोध लेता है. इस समझ के कारण आर्त ध्यान और रौद्र ध्यान उत्पन्न नहीं होते और स्वतः धर्म ध्यान उत्पन्न हो जाता है.

शुक्ल ध्यान को अत्यंत उच्च अवस्था माना गया है. सामान्य रूप से यह कहा जाता है कि वर्तमान पंचम काल में शुक्ल ध्यान दुर्लभ है, लेकिन अपवाद हर जगह होते हैं. शुक्ल ध्यान में व्यक्ति केवल द्रष्टा और ज्ञाता बनकर, घटनाओं को देखता है,
बिना राग-द्वेष के.

धर्म ध्यान और शुक्ल ध्यान के लिए न किसी विशेष आसन की आवश्यकता है, न किसी चक्र की, न किसी विधि की. सिर्फ सही समझ आवश्यक है.

एकाग्रता का सीमित लाभ

आम तौर पर हमें कहा जाता है — इस पर ध्यान करो, उस पर ध्यान करो, इस चक्र पर ध्यान करो, दीये पर ध्यान करो,
आंख बंद करके ध्यान करो. वास्तव में ये सभी विधियां एकाग्रता (Concentration) की हैं, ध्यान की नहीं.

एकाग्रता का अभ्यास मन को कुछ समय के लिए एक बिंदु पर रोक देता है. इससे मन की चंचलता कम होती है और व्यक्ति को थोड़ी देर के लिए शांति, सुख और आनंद का अनुभव होता है. यह अनुभव वास्तविक लगता है, इसलिए कई लोग इसे ही ध्यान मान लेते हैं. लेकिन यह शांति बाहर से आई हुई और परिस्थितियों पर आधारित होती है. जैसे ही एकाग्रता का अभ्यास समाप्त होता है, मन फिर से अपनी पुरानी आदतों में लौट आता है. विचारों की वही भीड़, वही इच्छाएं, वही भय और वही तनाव फिर से सक्रिय हो जाते हैं. यानी एकाग्रता से जो लाभ मिलता है, वह गहरा नहीं होता और स्थायी भी नहीं होता.

यदि हमें जीवन में स्थायी शांति, स्थायी सुख और स्थायी आनंद चाहिए, तो उसका मार्ग केवल मानसिक अभ्यास नहीं है, बल्कि सही दृष्टि और सही समझ है.

सही समझ विकसित होने पर आर्त ध्यान और रौद्र ध्यान स्वतः कमजोर पड़ जाते हैं. दुख, भय, क्रोध या प्रतिशोध की प्रवृत्तियां मन में जड़ नहीं पकड़ पातीं. और यदि किसी क्षण पुराने संस्कारों के कारण आर्त या रौद्र ध्यान उत्पन्न भी हो जाएं, तो जागरूकता के बल पर व्यक्ति तुरंत उसे पहचान लेता है.

सही मान्यताएं बनाम गलत मान्यताएं (राइट बिलीफ -रॉन्ग बिलीफ)

रॉन्ग बिलीफ यानी गलत मान्यताएं जीवन में दुख का कारण बनती हैं. गलत समझ के कारण सोच और आचरण दोनों गलत दिशा में चले जाते हैं, इसलिए चाहे कितनी भी साधना या ध्यान-प्रक्रिया क्यों न की जाए, परिणाम अशांति और असंतोष ही रहता है. गलत बीज से सही फल नहीं मिल सकता.

इसके विपरीत, राइट बिलीफ अर्थात सही मान्यता जीवन में सुख का आधार है. जब व्यक्ति समझ लेता है कि सुख-दुख का मूल कारण बाहर नहीं, भीतर है, तब उसकी दृष्टि और जीवन दोनों बदल जाते हैं. इसी कारण जैन दर्शन में सम्यक दर्शन को मोक्ष मार्ग की पहली सीढ़ी कहा गया है.

समझ ही आचरण का मूल है. गलत समझ से गलत आचरण होता है और सही समझ से आचरण अपने-आप शुद्ध होने लगता है. ऐसी स्थिति में किसी विशेष ध्यान-प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि सही समझ स्वयं जीवन को ध्यानमय बना देती है.

हमें आर्त ध्यान और रौद्र ध्यान से बाहर निकलकर धर्म ध्यान और शुक्ल ध्यान में रहना चाहिए. आर्त और रौद्र ध्यान आत्मा को नीचे ले जाते हैं, जबकि धर्म और शुक्ल ध्यान विवेक, समभाव और वैराग्य को बढ़ाते हैं. ध्यान का उद्देश्य क्षणिक शांति नहीं, बल्कि स्थायी आनंद और वीतराग अवस्था है. ध्यान किया नहीं जाता, ध्यान सही समझ से उत्पन्न होता है.

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