डॉ. पंकज जैन (ग्वालियर)
धर्मपाल जैन समाज भारत के उन नव-जैन समाजों में से है, जिसने न केवल जैन धर्म को अपनाया, बल्कि अपने जीवन, आचार-विचार और सामाजिक ढांचे को भी पूरी तरह बदल लिया. यह समाज किसी एक जाति से नहीं, बल्कि अनेक दलित-निम्न जाति समुदायों के समूह से बना है, जिसमें मालवा और गुजराती भाषी क्षेत्रों की जातियां प्रमुख हैं. इनमें बलाई (अनुसूचित जाति) समुदाय की संख्या सबसे अधिक मानी जाती है. संख्या के दृष्टि से यह समाज वीरवाल जैन समाज से भी कहीं अधिक है, परंतु बहु-जातीय संरचना के कारण यह सामाजिक रूप से अपेक्षाकृत कम संगठित रहा है.
धर्मपाल जैन वे लोग हैं, जो जैन धर्म के अनुसार पूर्ण आचार-विचार अपनाते हैं. नवकार मंत्र, सामायिक, प्रतिक्रमण जैसे जैन अनुष्ठान उन्हें कंठस्थ होते हैं. समय-समय पर जैन आचार्यों द्वारा शिविरों के माध्यम से उनकी धार्मिक परीक्षा भी ली जाती है. इनके संगठन और मार्गदर्शन के लिए अखिल भारतीय साधुमार्गी जैन संघ, बीकानेर सक्रिय रूप से कार्य करता है, जिसमें सभी धर्मपाल जैन पंजीकृत होते हैं. संघ इनके बच्चों की शिक्षा में भी सहयोग करता है.
धर्मपाल जैन समाज के प्रेरणास्रोत आचार्य श्री नानालालजी महाराज
धर्मपाल जैन समाज के निर्माण और विस्तार में आचार्य श्री नानालालजी महाराज (सा.) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक है. वे साधुमार्गी जैन संप्रदाय के आठवें आचार्य थे और समता विभूति, समीक्षण ध्यान योगी तथा धर्मपाल प्रतिबोधक के रूप में विख्यात रहे.
उनका जन्म वि.सं. 1977 (लगभग 1920 ई.) में जेठ सुदी 2 को राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में, कपासन के निकट भोपालसागर क्षेत्र के दांता गांव में हुआ. उनके पिता श्री मोडीलालजी और माता श्रीमती सिणगार बाई थीं. बचपन से ही वे आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे और सादगीपूर्ण जीवन जीते हुए जैन सिद्धांतों की ओर आकर्षित होते चले गए.
दीक्षा से आचार्य पद तक
कपासन (राजस्थान) में पूज्य श्री गणेशाचार्य द्वारा उन्हें मुनि दीक्षा प्रदान की गई, जिसके बाद वे मुनि नानालालजी कहलाए. आगे चलकर उदयपुर के महल में हजारों संतों और श्रावकों की उपस्थिति में उन्हें युवाचार्य पद प्रदान किया गया. बाद में वे आचार्य श्री नानालालजी महाराज बने और साधुमार्गी जैन संप्रदाय के प्रमुख आचार्य के रूप में प्रतिष्ठित हुए.
वे केवल आचार्य ही नहीं, बल्कि योगी, दार्शनिक, लेखक और प्रभावशाली प्रवचनकार भी थे. उन्होंने प्राचीन साधु परंपरा के अनुरूप कठोर संयम, तप और साधना का पालन किया.
मालवा में धर्मपाल आंदोलन की शुरुआत
जब आचार्य श्री नानालालजी महाराज मालवा प्रांत (रतलाम, उज्जैन, महिदपुर आदि) में विचरण कर रहे थे, तब उन्होंने देखा कि बलाई सहित कई दलित समुदाय मांसाहार, नशा और हिंसक प्रवृत्तियों से ग्रस्त हैं. उन्होंने करुणा और समता से भरे मार्मिक उपदेश देकर इन लोगों को अहिंसा, शाकाहार, सदाचार और जैन जीवन अपनाने के लिए प्रेरित किया.
1950 के दशक में ही यह आंदोलन आरंभ हो गया था, परंतु 1963-64 के रतलाम चातुर्मास के दौरान इसे एक स्पष्ट पहचान मिली. रतलाम चातुर्मास के बाद गुराडिया ग्राम से धर्मपाल प्रवृत्ति का औपचारिक शुभारंभ हुआ. इसी समय इस नव-जैन समाज को धर्मपाल नाम मिला, जो तीर्थंकर भगवान धर्मनाथ से जुड़ा है.
यह वह समय था जब देश को नई-नई स्वतंत्रता मिली थी और डॉ. भीमराव अंबेडकर जैसे विचारक दलित समाज के लिए नए धर्म और नए मार्ग की तलाश कर रहे थे. ऐसे ऐतिहासिक कालखंड में जैन धर्म का यह अहिंसक, नैतिक और समतामूलक मार्ग अनेक दलित समुदायों के लिए आशा का स्रोत बना.
लाखों लोगों का जीवन परिवर्तन
आचार्य श्री नानालालजी महाराज के प्रयासों से अनुमानतः एक लाख पच्चीस हजार तक लोग जैन धर्म से जुड़े और धर्मपाल जैन कहलाए. उन्होंने कठोर रूप से शाकाहार, अहिंसा, नशामुक्ति, सत्य और नैतिक जीवन को अपनाया. उनके आचार्यत्व काल में 59 संत और 310 आर्यिकाओं सहित अनेक मुमुक्षु आत्माओं को जैन भागवती दीक्षा प्रदान की गई.
उन्होंने समता दर्शन का विशेष प्रचार किया. उनकी प्रसिद्ध पुस्तक समता-दर्शन और व्यवहार ने समाज में समानता, सौहार्द और विषमता-मुक्त जीवन का संदेश दिया. यह पुस्तक कई भाषाओं में प्रकाशित हुई और व्यापक रूप से पढ़ी गई.

नारायणखेड़ी : धर्मपाल जैन समाज का आदर्श उदाहरण
मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले की महिदपुर तहसील में स्थित नारायणखेड़ी गांव धर्मपाल जैन समाज का प्रेरक उदाहरण है. लगभग 700 आबादी वाले इस गांव में गुजराती मालवीय समाज के 40 परिवार रहते हैं और लगभग हर घर से एक सदस्य जैन संतों की सेवा में लगा हुआ है. यह गांव पूरी तरह व्यसन-मुक्त है.
लगभग 58 वर्ष पहले यह गांव वैष्णव परंपरा से जुड़ा था. स्वर्गीय मोहनलाल राठौर के प्रयासों से समाज जैन धर्मपाल से जुड़ा. आज इसका परिणाम यह है कि गांव में शिक्षा, रोजगार, अनुशासन और नैतिकता का स्तर अत्यंत ऊंचा है. जैन समाज के उद्योगपति यहां के युवाओं को नौकरी में प्राथमिकता देते हैं.
2004 में नारायणखेड़ी में समता भवन का निर्माण हुआ, जहां प्रतिदिन बच्चों को धर्म शिक्षा दी जाती है. महिलाओं के लिए सिलाई मशीन की व्यवस्था है, जिससे वे स्वावलंबी बन रही हैं. यहां आने वाला कोई बाहरी व्यक्ति भी शराब नहीं पीता, यह गांव की विशेष पहचान बन चुकी है.
धर्मपाल जैन बनने के बाद लोगों की ज़िंदगियां पूरी तरह बदली हैं. कोई जैन संतों की सेवा में रहकर आत्मिक शांति पा रहा है, कोई जैन छात्रावास में पढ़कर सरकारी शिक्षक बन रहा है, तो कोई देश के विभिन्न हिस्सों में सेवा और रोजगार से जुड़कर अपने परिवार और समाज को आगे बढ़ा रहा है.
निष्कर्ष
धर्मपाल जैन समाज केवल एक धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि सामाजिक उत्थान, नैतिक पुनर्जागरण और आत्मिक परिवर्तन का आंदोलन है. आचार्य श्री नानालालजी महाराज के जीवन और कार्यों ने यह सिद्ध किया कि अहिंसा, समता और करुणा के माध्यम से समाज के सबसे वंचित वर्गों को भी आत्मगौरव, अनुशासन और उज्ज्वल भविष्य की ओर ले जाया जा सकता है. आज मालवा क्षेत्र में धर्मपाल जैन समाज की सशक्त उपस्थिति उसी महान तपस्वी आचार्य की जीवंत विरासत है.
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