घर–परिवार छोड़ा, पर महत्वाकांक्षाएं नहीं छोड़ी

नितिन जैन (पलवल, हरियाणा)

मोबाइल: 9215635871

घर–परिवार छोड़ना त्याग कहलाता है, परंतु त्याग केवल वस्त्र बदल लेने या स्थान बदल लेने से सिद्ध नहीं होता. वास्तविक त्याग तब है जब भीतर की महत्वाकांक्षाएं, पद–लालसा, प्रतिष्ठा की भूख और प्रभाव जमाने की आकांक्षा भी छूट जाए. जिसने घर छोड़ा, पर मन में संग्रह, नियंत्रण और वर्चस्व की चाह जीवित रखी—वह त्यागी नहीं, केवल भूमिका बदलने वाला है. बाहर से विरक्ति का प्रदर्शन और भीतर से महत्वाकांक्षा की आग—यही वह द्वंद्व है जो धर्म को सबसे अधिक क्षति पहुंचाता है.

पर सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब घर–परिवार छोड़ा गया, तो क्या अहंकार भी छोड़ा गया. यदि अहंकार जीवित है, तो त्याग केवल बाहरी है. स्वयं को विशेष समझना, अपनी बात को अंतिम सत्य मानना, आलोचना को अपराध मान लेना—ये सब अहंकार के ही रूप हैं. जिसने अहंकार का त्याग नहीं किया, वह साधना नहीं कर रहा, वह केवल प्रभाव बना रहा है.

त्याग का अर्थ है इच्छाओं का क्षय, न कि इच्छाओं के लिए मंच का विस्तार. परिवार छोड़ा, पर परिवार जैसा अनुयायी–वृत्त खड़ा कर लिया. संपत्ति छोड़ी, पर निर्णयों पर कब्ज़ा नहीं छोड़ा. संबंध छोड़े, पर प्रशंसा और भय के संबंध बना लिए—यह सब त्याग नहीं, यह महत्वाकांक्षा का रूपांतरण है.

यही महत्वाकांक्षा आगे बढ़कर पदों की भूख बन जाती है. पद चाहिए, पदवी चाहिए, विशेष सम्मान चाहिए, मंच पर सबसे ऊंची कुर्सी चाहिए—और यदि पद न मिले तो भीतर ही भीतर असंतोष, कटुता और षडयंत्र जन्म लेने लगते हैं. जिसने वास्तव में त्याग किया होता है, उसे पद से क्या लेना–देना.

इसी क्रम में कार्यक्रमों में भव्यता की महत्वाकांक्षा खड़ी होती है—बड़े पंडाल, भारी खर्च, दिखावटी सजावट और प्रचार. सादगी त्याग की पहचान होती है, पर जब भव्यता प्रतिस्पर्धा बन जाए, तो स्पष्ट है कि भीतर वैराग्य नहीं, प्रदर्शन पल रहा है.

और जब महत्वाकांक्षा और गहरी होती है, तो नेताओं को कार्यक्रमों में बुलाने की चाह जन्म लेती है. धर्म के मंच पर सत्ता के चेहरे चाहिए, फोटो चाहिए, पहचान चाहिए, प्रभाव चाहिए. साधना पीछे छूट जाती है और संपर्क–साधना आगे आ जाती है.

अहंकार का यही रूप आगे चलकर असहिष्णुता बनता है. जो सच बोले, उसे धमकाना. जो प्रश्न करे, उसे विद्रोही ठहराना. और जो न झुके, उसके विरुद्ध झूठे मुकदमे गढ़ना—ये सब उसी अहंकार और महत्वाकांक्षा के परिणाम हैं, जिनका त्याग कभी हुआ ही नहीं. त्यागी वह है जो स्वयं को छोटा करे, न कि दूसरों को डराकर बड़ा बने.

समाज को आज बाहरी वेश नहीं, भीतरी शुद्धि की आवश्यकता है. घर–परिवार छोड़ना प्रारंभ हो सकता है, पर अंतिम कसौटी भीतर की महत्वाकांक्षाओं और अहंकार के त्याग की है—पद की, पदवी की, भव्यता की और सत्ता–समीपता की. यदि अहंकार जीवित है, तो त्याग का दावा केवल आवरण है—सत्य नहीं.

++++

नितिन जैन जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम, पलवल (हरियाणा) के संयोजक है.

यह भी पढिये …..

गुरु-शिष्य परंपरा से गुरु–भक्त परंपरा तक : जैन समाज की अवनति का मूल कारणमोक्ष की बातें करने वाले सुन लो… पहले अपना भेद तो छोड़ो!
अहिंसा : नियम की नहीं, समझ की जरूरतमहावीर और उनके अनुयायी
दलित और आदिवासियों को जैन धर्म अपनाना चाहिए!बिना साधुओं और बिना मंदिरों का जैन समाज
जैन दर्शन का सारनए ज़माने में नए जैन धर्म की ज़रूरत

Jains & Jainism (Online Jain Magazine)

They Won Hindi (हिंदी कहानियां व लेख)

TheyWon
English Short Stories & Articles

न्यूमरॉलॉजी हिंदी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *