गुरु-शिष्य परंपरा से गुरु–भक्त परंपरा तक : जैन समाज की अवनति का मूल कारण

नितिन जैन (पलवल, हरियाणा)

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जैन समाज की अवनति का मूल कारण गुरु-शिष्य परंपरा से हटकर गुरु–भक्त परंपरा की ओर जाना है!

कभी जैन समाज में गुरु–शिष्य परंपरा हुआ करती थी. यह परंपरा केवल ज्ञान देने-लेने की नहीं थी, बल्कि चरित्र निर्माण, तप, त्याग, अनुशासन और आत्मसंयम की कठोर साधना पर आधारित थी. शिष्य गुरु के पास आशीर्वाद लेने नहीं, बल्कि अपने अहंकार को तोड़ने, इच्छाओं को त्यागने और सत्य के मार्ग पर चलना सीखने जाता था.

गुरु भी शिष्य को वही सिखाता था जो आगमसम्मत हो, जो स्वयं के आचरण में उतरा हुआ हो और जो समाज को नहीं, आत्मा को केंद्र में रखता हो. परंतु आज यही परंपरा लगभग समाप्त हो चुकी है और उसकी जगह गुरु–भक्त परंपरा ने ले ली है. यही परिवर्तन जैन समाज की अवनति का सबसे बड़ा और मूल कारण बन गया है.

गुरु–शिष्य परंपरा में शिष्य प्रश्न करता था, तर्क करता था, आत्मपरीक्षण करता था. गुरु को भी अपने आचरण और कथन के लिए उत्तरदायी होना पड़ता था. जहांअंधभक्ति नहीं थी, वहां विवेक था.

आज की गुरु–भक्त परंपरा में भक्त प्रश्न नहीं करता, विवेक का प्रयोग नहीं करता, बस जयकार करता है, भीड़ बढ़ाता है और गुरु को आलोचना से परे मान लेता है. जैसे ही प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति समाप्त होती है, वैसे ही पतन शुरू हो जाता है.

आज स्थिति यह है कि भक्तों की संख्या को ही गुरु की महानता का मापदंड मान लिया गया है. जितनी बड़ी भीड़, उतना बड़ा गुरु. जितना अधिक प्रदर्शन, उतना अधिक प्रभाव. आगम, संयम और मर्यादा पीछे छूटते जा रहे हैं और मंच, प्रचार, व्यवस्थाएं और चढ़ावे आगे आ रहे हैं. गुरु–शिष्य परंपरा आत्मशुद्धि की बात करती थी, जबकि गुरु–भक्त परंपरा सुविधा और भावनात्मक आकर्षण की. यही कारण है कि आज समाज में धर्म का स्वरूप साधना से अधिक आयोजन बनता जा रहा है.

गुरु–शिष्य परंपरा में शिष्य गुरु के दोष भी देखता था और उनसे सीख लेकर स्वयं को सुधारता था. गुरु भी जानता था कि शिष्य अंधा नहीं है, इसलिए उसे हर कदम सोच-समझकर रखना होता था. आज गुरु–भक्त परंपरा में भक्त गुरु के दोषों पर परदा डालता है, उन्हें सही ठहराने के तर्क गढ़ता है और जो व्यक्ति प्रश्न उठाए, उसे धर्मद्रोही घोषित कर देता है. इससे न गुरु सुधरता है और न समाज.

जैन धर्म आत्मनिर्भरता सिखाता है, पर आज भक्त निर्भरता सीख रहा है. हर समस्या का समाधान गुरु के एक वाक्य, एक आशीर्वाद या एक फोटो में खोजा जा रहा है. शास्त्र पढ़ना, स्वयं चिंतन करना, आत्मावलोकन करना कठिन लगने लगा है. यही मानसिक आलस्य समाज को भीतर से कमजोर कर रहा है.

यदि जैन समाज को वास्तव में बचाना है तो हमें फिर से गुरु–शिष्य परंपरा की ओर लौटना होगा. प्रश्न करने का साहस, सत्य बोलने की हिम्मत और आगम के आधार पर आचरण की अपेक्षा—इन तीनों को पुनः स्थापित करना होगा. गुरु पूज्य अवश्य हों, पर अचूक नहीं. भक्ति हो, पर विवेक के साथ. यही संतुलन जैन समाज की वास्तविक शक्ति रहा है.

जब तक हम गुरु–भक्त बनकर तालियाँ बजाते रहेंगे और गुरु–शिष्य बनकर आत्मसंयम नहीं सीखेंगे, तब तक समाज की अवनति रुकने वाली नहीं है. यह कटु सत्य है, पर यही सत्य सुधार का पहला कदम भी है.

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नितिन जैन जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम, पलवल (हरियाणा) के संयोजक है.

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