णमोकार मंत्र का इतिहास

संजय सोनवणी

णमोकार मंत्र (जिसके अन्य नाम— नमोकार, नवकार, नमस्कार मंत्र, पंच-णमोक्कारा है) वह मन्त्र है जिसे दुनिया भर के अधिकांश जैन लोग रोज़ या दिन में कई बार जपते हैं. जो लोग जैन परंपरा में पैदा नहीं हुए, वे भी इस मंत्र का जप करते हुए पाए गए हैं. इस मंत्र को मूल मंत्र, महामंत्र, पंच नमस्कार मंत्र या पंच परमेष्ठी मंत्र भी कहा जाता है.

असल में, जैन दर्शन का मूल सार इस मंत्र में समाया है, इसलिए अध्ययन करने वालों के लिए भी इसका विशेष महत्त्व है. जैन परंपरा में इस मंत्र का आध्यात्मिक महत्व अत्यंत उंचा माना जाता है.

जैन मान्यता के अनुसार णमोकार मंत्र सदैव से विद्यमान है—इसे न तो किसी ने बनाया है और न ही किसी व्यक्ति ने लिखा है. यह अनादि है.

णमोकार मंत्र और उसका अर्थ

आज जो स्वरूप सर्वत्र मान्य है (थोड़े बहुत उच्चारण भेद छोड़कर) वह इस प्रकार है—

णमो अरिहंताणं
(अरिहंतों को नमस्कार)

णमो सिद्धाणं
(सिद्धों को नमस्कार)

णमो आयरियाणं
(आचार्यों को नमस्कार)

णमो उवज्झायाणं
(उपाध्यायों को नमस्कार)

णमो लोए सव्व साहूणं
(संसार के सभी साधु-साध्वियों को नमस्कार)

एसो पंचणमोक्कारो, सव्व पावप्पणासणो
मंगला णं च सव्वेसिं, पडमम हवई मंगलं
(यह णमोकार महामंत्र सभी पापों का नाश करने वाला है. यह सभी मंगलों में सबसे श्रेष्ठ और सर्वोपरि मंगल है.)

णमोकार मंत्र का इतिहास

प्राप्त ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार, यह मंत्र समय के साथ विकसित होता गया है. पुरातात्विक साक्ष्यों से यह पता चलता है कि इस मंत्र की शुरुआती पंक्तियां ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी के हाथीगुंफा (उड़ीसा) में सम्राट खारवेल के शिलालेख में मिलती हैं.

इसके बाद महाराष्ट्र के लोहगड और पाले के ईसा पूर्व दूसरी से पहली शताब्दी के शिलालेखों में भी इस मंत्र की पहली पंक्ति अंकित मिलती है.

हाथीगुंफा शिलालेख

यह शिलालेख ओडिशा की उदयगिरी पहाड़ियों में खुदी हुई गुफाओं में से एक बड़ी गुफा में पाया गया है. इसमें कुल 17 पंक्तियों का लेख है, जिसकी शुरुआत इस प्रकार होती है—

“नमो अरहंतानं नमो सव-सिधानं”

इसके आगे सम्राट खारवेल द्वारा अपने शासनकाल में किए गए अनेक कार्यों और विजय अभियानों का वर्णन मिलता है. इस लेख में पूरा णमोकार मंत्र नहीं मिलता, और जो भाग मिलता है, उसमें भी उच्चारण के कुछ भेद दिखाई देते हैं.

उदाहरण के लिए, यहां मंत्र में आया हुआ “सव” (सव्व?) शब्द आगे के अन्य मंत्र संस्करणों में नहीं मिलता. यह शिलालेख ईसा पूर्व 162 का है—ऐसा विद्वानों का सामान्यत: स्वीकार किया गया मत है.

लोहगढ़ (महाराष्ट्र) का शिलालेख

महाराष्ट्र के लोहगढ़ में मिली जैन गुफाओं में एक दान-शिलालेख मिला है, जिसकी शुरुआत इस प्रकार है—
“णमो अरहंताणम्”

पाले (महाराष्ट्र) का शिलालेख

महाराष्ट्र के पाले में मिली एक जैन गुफा में भी एक दान-शिलालेख मिला है. इसकी शुरुआत भी
“णमो अरहंताणम्”
इसी प्रकार से होती है.

माना जाता है कि लोहगढ़ और पाले—दोनों शिलालेख भदंत इदरखित नामक उसी एक व्यक्ति द्वारा खुदवाए गए थे, क्योंकि दोनों शिलालेखों में यही नाम अंकित है.

लिपि और भाषा

उपर्युक्त तीनों शिलालेख ब्राह्मी लिपि में हैं, और उनकी भाषा प्रादेशिक प्राकृत है. इस कारण कुछ स्थानीय भाषाई भेद स्वाभाविक रूप से उत्पन्न हुए होंगे.

पुरातत्व विभाग का अनुमान है कि लोहगढ़ और पाले के दोनों शिलालेख ईसा पूर्व दूसरी से पहली शताब्दी के बीच खुदवाए गए होंगे.

संक्षेप में कहा जाए तो प्राचीन शिलालेखों में णमोकार मंत्र का केवल संक्षिप्त रूप ही मिलता है—और यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि शिलालेखों में जगह की सीमाएँ होती थीं.

लेकिन इतना स्पष्ट है कि ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में यह मंत्र समाज में निश्चित रूप से प्रचलित था.

पहला ग्रंथीय उल्लेख

इस मंत्र का पहला साहित्यिक (ग्रंथिक) उल्लेख “वासुदेवहिंडी” नामक ग्रंथ में मिलता है. यह ग्रंथ श्वेतांबर पंथ के संघदास गणी द्वारा ईसवी सन् दूसरी–तीसरी शताब्दी के बीच लिखा गया था.

इसमें मंत्र का विस्तृत रूप मिलता है, परंतु वह आज के पूर्ण रूप जैसा नहीं है. इसमें आज के मंत्र में न पाए जाने वाले कई व्याख्यात्मक (explanatory) शब्द जोड़े गए हैं. इन्हें हटाकर जो मूल मंत्र मिलता है, वह इस प्रकार है—

“नमो ….. अरहंताणं
नमो ….. सिद्धाणं
नमो ….. अयरियाणं
नमो ….. उवज्झायाणं
नमो ….. साहूणं”

मंत्र के बीच में जो शब्द छोड़े गए हैं, उन्हें हम मंत्र की पहली ही पंक्ति से समझ सकते हैं. संघदास गणी द्वारा दिए गए मंत्र में मूल शब्द तो वैसे ही हैं, लेकिन उनके बीच व्याख्यात्मक (स्पष्टीकरण वाले) शब्द जोड़े गए हैं. उदाहरण—

णमो विनयपनयसुरिंदविंदवंदियकमारविंदाणं अरहंताणं

आप देख सकते हैं कि ऊपर दिए गए सभी मंत्रों में कहीं न कहीं शब्द-विस्तार या पाठभेद मौजूद हैं. इसके अलावा, समय के साथ मंत्र धीरे-धीरे विस्तृत होता गया है.

“अरहंताणं” के स्थान पर “अरिहंताणं” शब्द का प्रयोग सबसे पहले भद्रबाहु ने अपनी रचना कल्पसूत्र में किया. यह ग्रंथ भले ही ईसा पूर्व चौथी शताब्दी का माना जाता है, परंतु उपलब्ध आंतरिक प्रमाणों के आधार पर यह लिखित रूप में पांचवीं–छठी शताब्दी में वल्लभी धर्मसभा के समय राजा ध्रुवसेन के शासनकाल में आया होगा.

मूल मौखिक संहिता में यह मंत्र था या नहीं—यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता.
(देखें—कल्पसूत्र और भद्रबाहू प्रथम)

संपूर्ण णमोकार मंत्र

संपूर्ण णमोकार मंत्र सबसे पहले भद्रबाहु द्वारा लिखित कल्पसूत्र में मिलता है. इससे पहले प्रतीत होता है कि यह मंत्र क्रमशः विकसित हो रहा था, या फिर शिलालेखों में स्थान की कमी के कारण इसे संक्षिप्त रूप में ही अंकित किया जाता था.

लेकिन कल्पसूत्र में आज जो पूरा मंत्र बोला जाता है—वही उसी रूप में मिलता है, जैसा ऊपर दिया गया है. 1933 में बनस्थली में प्रकाशित कल्पसूत्र की प्रतियों से भी यह स्पष्ट होता है कि णमोकार मंत्र का पूर्ण विकसित स्वरूप उसमें उपलब्ध है.

महाकवि पुष्पदंत (9वीं–10वीं सदी) ने भी “अरिहंताणं” यही संज्ञा प्रयोग की है.

तिलोयपन्नत्ती जैसे प्राचीन ग्रंथ में, अरिहंतों के स्थान पर सबसे पहले सिद्धों को वंदन किया गया है.

मंत्र में प्रयुक्त संज्ञाएं और उनका अर्थ

आज जैन समाज जिस अर्थ में इस मंत्र को समझता है, वही अर्थ सबसे पहले “वासुदेवहिंडी” में संघदास गणी ने दिया है. उनके अनुसार—

अरहंत (अर्हत): वे तीर्थंकर या महानात्माएं जो सर्वज्ञता प्राप्त कर चुकी हैं और जो जगत के लिए धर्म का उपदेश देने हेतु मूर्त रूप धारण करते हैं. इनके “कमल सदृश चरण” देवों द्वारा पूजनीय माने गए हैं.

सिद्ध: वो आत्माएं जिन्होंने सभी कर्मों का पूर्ण नाश कर लिया है और अब तटस्थ एवं वैराग्यपूर्ण दृष्टि से ब्रह्मांड का अनुभव करती हैं.

आचार्य: तपस्वी समुदायों के विश्वसनीय नेता—जो सही तपस्वी आचरण का सर्वोच्च आदर्श प्रस्तुत करते हैं.

उपाध्याय: वे साधु जो ज्ञान प्रदान करने का दायित्व निभाते हैं और जैन शास्त्रों का उपदेश देते हैं.

साधु / साध्वी: अतीत और वर्तमान के सभी तपस्वी—जो कर्म-नाश के लिए उत्तम आचरण का अनुसरण करते हैं.

बाद में 7वीं सदी के श्वेतांबर ग्रंथ महानिशीह-सुह (महानिशिथ सूत्र) में पंच परमेष्ठियों के अर्थों की बहुत विस्तृत व्याख्या दी गई.
इसमें अरहंत शब्द की व्याख्या विशेष रूप से महत्वपूर्ण और व्यापक है.

9वीं सदी के वीरसैन, जिन्होंने धवला टीका लिखी, उन्होंने भी मूल अर्थ बदले बिना अर्थ-विस्तार किया है.

श्वेतांबर और दिगंबर—दोनों परंपराओं के आचार्यों द्वारा दी गई परिभाषाओं में पर्याप्त समानता दिखाई देती है.

12वीं सदी में देवेंद्र द्वारा लिखित उत्तराध्ययन सूत्र की टीका में भी इस मंत्र का विस्तृत अर्थ मिलता है. उनके अनुसार—

णमोकार मंत्र आनंद देने वाला, सुरक्षा प्रदान करने वाला, आध्यात्मिक रूप से लाभदायक और कर्म-नाशकारी ध्वनि है.

12वीं सदी के ये अर्थ आज भी जैन समाज की लोकप्रिय मान्यताओं से पूरी तरह मेल खाते हैं.

संदर्भ

1. वासुदेवहिंडी, संघदास गणी, प्रकाशक- श्रीजैन आत्मानंद सभा, भावनगर.

2. Kalpasutra of Bhadrabahu Swami by Kastur Chand Lalwani, pub. Motilal Banarasidas, 1979

3. Roth, Gustav. 1986. “Notes on the Paṃca-Namokkāra-Parama-Maṅgala in Jain Literature.” In Heinz Bechert and Petra Kieffer-Pülz (eds.), Indian Studies (Selected Papers). Delhi: Sri Satguru Publications. pgs. 129-146.

संजय सोनवणी जी प्रख्यात लेखक, इतिहास के खोजी, धर्म चिकित्सक और विचारक है.

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