सिर्फ सम्प्रदायवाद नहीं, जैन समाज में जातिवाद और प्रांतवाद भी है!

महावीर सांगलीकर

jainway@gmail.com

जैन समाज सम्प्रदायवाद का शिकार है. सम्प्रदायवाद यह एक ऐसी मानसिकता है जिसमें लोग अपने संप्रदाय को ही सर्वोच्च मानते हैं और बाकी संप्रदायों को कमतर समझने लगते हैं. दुख की बात यह है कि बहुत से जैनियों को अपने संप्रदायवादी होने पर शर्म नहीं, बल्कि गर्व महसूस होता है. वे यह मानते हैं कि उनका संप्रदाय ही सही है और बाकी लोग किसी न किसी रूप में गलत हैं.

वास्तव में संप्रदायवादी सोच एक प्रकार का मनोविकार है. यह मानसिकता तब पैदा होती है जब व्यक्ति की सोच बहुत सीमित हो जाती है और वह अपने छोटे से दायरे से बाहर देखने की क्षमता खो देता है. ऐसी सोच सेपरेटिस्ट मानसिकता से जन्म लेती है—यानी अपने आपको दूसरों से अलग और श्रेष्ठ समझने की प्रवृत्ति से. जब व्यक्ति या समूह यह सोचने लगता है कि हम अलग हैं, हम विशेष हैं और बाकी लोग हमसे कम हैं, तभी संप्रदायवाद की जड़ें मजबूत होने लगती हैं.

इसके पीछे कई सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण भी होते हैं. खराब परवरिश, जीवन में बार-बार असफलता का अनुभव, पारिवारिक तनाव, या रिश्तों में असंतोष जैसी स्थितियां व्यक्ति को अंदर से असुरक्षित बना देती हैं. जब व्यक्ति भीतर से कमजोर महसूस करता है, तब वह किसी संप्रदाय, जाति या समूह की पहचान में अपने लिए सुरक्षा और गर्व खोजने लगता है. धीरे-धीरे यह पहचान उसकी सोच को इतना सीमित कर देती है कि वह दूसरों के प्रति असहिष्णु हो जाता है.

जैन समाज में जातिवाद

लेकिन जैन समाज की समस्या केवल संप्रदायवाद तक सीमित नहीं है. इस समाज में संप्रदायवाद साथ-साथ जातिवाद, प्रांतवाद और भाषावाद भी बड़ी मात्रा में मौजूद हैं. इन सभी प्रवृत्तियों ने मिलकर जैन समाज को कई छोटे-छोटे हिस्सों में बांट दिया है.

जैनियों में भी कई जातियां हैं, और यह सभी जातियां अपने-अपने संकुचित दायरे में जीती हैं. यह जातियां एक दूसरे से ज्यादा संबंध नहीं रखती, छूट-पुट अपवादों को छोड़कर इनमें वैवाहिक संबंध भी नहीं बनते. इनके अपने-अपने जैन मंदिर होते हैं, जो दिखने में तो संप्रदाय के अनुसार होते हैं , लेकिन वास्तव में किसी जातिविशेष से संबंधित होते हैं. कई जगह तो मंदिर के नाम में जाति का भी उल्लेख किया जाता है, जैसे कि ‘खंडेलवाल दिगंबर जैन मंदिर’ आदि.

बनिया जैन जातियों में दस्सा और बिस्सा ऐसी दो उपजातियां होती है. एक ही जाती के होकर भी यह लोग एक दूसरे से ज्यादा संबंध नहीं रखते.

बड़ी और प्रस्थापित जैन जातियों ने अन्य जैन जातियों का हमेशा तिरस्कार किया। जैन समाज की जनसंख्या कम होने का एक बड़ा कारण प्रस्थापित जैन जातियों ने दूसरी जैन जातियों को जैन समाज से निकाल दिया यह है. इसके कई सारे उदहारण मेरे पास हैं, जिनकी चर्चा मैं एक अलग लेख में करूंगा.

भाषावाद और प्रांतवाद

जैनियों में भी भाषावाद और प्रांतवाद भी बड़े पैमाने पर दिखाई देता है. भाषावाद और प्रांतवाद एक दूसरे से संबंधित है, इसलिए मैं उनकी एकत्रित चर्चा कर रहा हूं.

भारत के हर प्रान्त में दो प्रकार के जैन समाज है. एक है स्थानीय जैन समाज, और दूसरा है किसी दूसरे प्रान्त से उस प्रान्त में आकर बसा हुआ जैन समाज. देखा जाता है कि दूसरे प्रान्त से आकर किसी प्रान्त में में बसा हुआ जैन समाज स्थानीय जैन समाज से ज्यादा घुल-मिल नहीं जाता. इनकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे जिस प्रदेश में बसे हुए है (मतलब जिस प्रदेश ने उन्हें रोजी रोटी दी, सम्पन्नता दी), उस प्रदेश से, वहां के लोग, वहां की भाषा और संस्कृति से उनका कोई लगाव नहीं रहता. यह लोग अपने मूल प्रदेश का ही गुणगान करते रहते हैं. भले ही उनकी कई पीढ़ियों का जन्म इस नए प्रदेश में हुआ हो, और उनका उनके मूल प्रदेश से कोई संबंध भी न हो.

इनकी एक और विशेषता यह है कि वह घर में और आपस में अपने मूल प्रदेश की भाषा ही बोलते हैं, और स्थानीय भाषा (जो चाहे जितनी सशक्त और संपन्न हो, फिर भी) को महत्व नहीं देते. इस कारण जिस प्रदेश में यह लोग रहते हैं, वहां की भाषा, साहित्य, नाटक, सिनेमा आदि के विकास में इनका कोई योगदान नहीं होता है. हो भी नहीं सकता, कारण है उनकी संकुचित मानसिकता.

प्रवासी जैनियों के इस रवैये से उनकी अवस्था धोबी के कुत्ते जैसी हो गई है. आउटसाइडर्स बनकर रहना इन्हें अच्छा लगता है, लेकिन उनका उनके मूल प्रदेश से कोई संबंध नहीं होता, और वे जिस प्रदेश में रहते है वहां के स्थानीय लोग भी उनका स्वीकार नहीं करते (करें भी क्यों, क्यों कि प्रवासी जैन लोग अपने आपको उस प्रदेश का मानते ही नहीं).

कुल मिलाकर सम्प्रदायवाद, जातिवाद, भाषावाद और प्रांतवाद ने जैन समाज को संकुचित बनाया है. इसी कारण वह कुछ बड़ा नहीं सोच सकते.

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