निर्दोष दृष्टि: उपदेशों के पीछे छुपा रहस्य

अशोक डी. कोठारी

अक्सर हमें उपदेश दिए जाते हैं कि यह मत करो, वह मत करो, झूठ मत बोलो, हिंसा मत करो, व्यभिचार मत करो, धोखा मत दो, निंदा मत करो, बुरा आचरण मत करो, समभाव रखो, संयम रखो. ये सब बातें हमें बार-बार सुनाई जाती हैं. लेकिन सवाल यह है कि यह सब क्यों नहीं करना है और इन्हें रोकें कैसे, इस दृष्टि से बहुत कम समझाया जाता है.

हम सबको पता है कि झूठ नहीं बोलना चाहिए, हिंसा नहीं करनी चाहिए. लेकिन यह तो केवल उत्तर हैं. असली सवाल यह है कि यह प्रश्न पैदा कहां से हुआ. इसका जड़ मूल क्या है, रूट कॉज क्या है. यह बात कौन समझाएगा, इसका उपदेश कौन देगा.

हम वर्षों से प्रवचन, कथाएं, वार्ताएं, कहानियां, भागवत सप्ताह और अलग-अलग व्याख्यान सुनते आ रहे हैं. हर जगह यही सुनते हैं कि ऐसा मत करो, वैसा मत करो. लेकिन अगर हम अपने जीवन का अवलोकन करें, तो खुद से पूछें कि इससे हमारे जीवन में कितना फर्क पड़ा. अपवाद को छोड़ दें तो सच्चाई यह है कि बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ा. मैं किसी एक व्यक्ति की बात नहीं कर रहा, सामान्य स्थिति की बात कर रहा हूं.

ऐसा क्यों होता है. इसलिए क्योंकि इन बातों के पीछे का रहस्य बताया नहीं जाता. यह नहीं समझाया जाता कि इसके मूल में क्या है. क्यों नहीं बताया जाता, यह तो उपदेशक, कथाकार या वक्ता ही जानें. लेकिन उन्हें भी खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि जो उपदेश वे दे रहे हैं, क्या वही बातें उनके अपने जीवन और आचरण में हैं. अगर हैं, तो यह अच्छी बात है. लेकिन फिर यह भी बताना चाहिए कि यह आचरण उनके जीवन में कैसे आया, उसके पीछे का रहस्य क्या है.

और अगर खुद के जीवन में भी यह पूरी तरह नहीं उतरा है, तो ईमानदारी से यह कहना चाहिए कि हमें सिर्फ इतना पता है कि झूठ मत बोलो, चोरी मत करो, यह मत करो, वह मत करो. लेकिन इसके पीछे का रहस्य हमें भी नहीं पता. उस रहस्य को जानने की जरूरत है.

यह रहस्य क्या है?

इस रहस्य का नाम है निर्दोष दृष्टि. वरना यही होता है कि यह मत करो, वह करो, यह मत करो, वह मत करो, यह सुन-सुनकर लोग थक जाते हैं. हालत यह हो जाती है कि अब सुनने का मन भी नहीं करता, लेकिन जीवन में फिर भी कोई बदलाव नहीं आता.

हमें निर्दोष दृष्टि चाहिए. कैसी दृष्टि. भगवान ऋषभदेव जैसी, भगवान पार्श्वनाथ जैसी, भगवान महावीर स्वामी जैसी. भगवान महावीर स्वामी ने कहा कि मैंने खुद को भी निर्दोष देखा और पूरे जगत को भी निर्दोष देखा. तभी उनके भीतर केवल ज्ञान उत्पन्न हुआ.

हम यह नहीं कह रहे कि हमारे पास भगवानों जैसी पूर्ण निर्दोष दृष्टि आ जाए. वह तो बहुत ऊंची अवस्था है. लेकिन उनके समकक्ष, उसी दिशा की निर्दोष दृष्टि तो आ सकती है. जब दृष्टि ऐसी हो जाए कि पूरा जगत, सारे जीव निर्दोष दिखें, किसी में दोष दिखे ही नहीं, और जो भी दोष दिखें, वे अपने ही भीतर दिखें.

जब ऐसा होता है तो व्यक्ति अपने दोषों का प्रतिक्रमण करता है, उन्हें नष्ट करने का प्रयास करता है. तब कोई चाहे मान दे या अपमान करे, व्यक्ति समभाव में रह सकता है. समता रख सकता है. न राग रहता है, न द्वेष. ऐसी दृष्टि जिसे मिलती है, वही दूसरों को भी वैसी दृष्टि दे सकता है.

इसलिए विनती है कि चाहे कोई गृहस्थ हो या संन्यासी, जैन हो या किसी और धर्म का हो, अगर आपके पास ऐसी निर्दोष दृष्टि है तो दूसरों को दीजिए. और अगर नहीं है, तो इसे जानने और समझने का प्रयास कीजिए. इसके लिए निर्दोष दृष्टि और कर्म सिद्धांत से जुड़े वीडियो देखना उपयोगी है.

भगवान पार्श्वनाथ के जीवन में कमठ देव ने उन्हें बहुत कष्ट दिए. फिर भी उनके मन में न उसके प्रति द्वेष था, न सेवा करने वाले धरेंद्र और पद्मावती के प्रति राग. दोनों के प्रति समान भाव था. यही सम दृष्टि है, यही निर्दोष दृष्टि है.

भगवान महावीर स्वामी के जीवन में तो इससे भी कई गुना अधिक कष्ट आए. संगम देव द्वारा दिए गए उपसर्ग हों या ग्वाले द्वारा कानों में कील ठोंकने जैसी भयानक पीड़ा, हर स्थिति में उन्होंने समता बनाए रखी. उन्होंने किसी के प्रति द्वेष नहीं किया. क्योंकि उन्हें पता था कि यह सब उनके ही पूर्व कर्मों का फल है.

जब कारण हमारे कर्म हैं, तो निमित्त चाहे देव हो, मानव हो, पशु हो या परिस्थितियां हों, सब निर्दोष हैं. सुख या दुख, जो भी आता है, वह हमारे ही कर्मों का परिणाम है. क्रिया की प्रतिक्रिया होती ही है. एक्शन का रिएक्शन होता ही है. बिना कारण कोई परिणाम नहीं होता.

जब यह समझ गहरी हो जाती है, तो फिर किसी को दोष देने का मन नहीं करता. आदमी खुद की भूल देखता है. तब झूठ, धोखा, हिंसा, व्यभिचार, ईर्ष्या, निंदा, चुगली, माया-कपट, सब अपने आप छूटने लगते हैं. अलग से यह मत करो, वह मत करो कहने की जरूरत नहीं रहती.

यही वजह है कि इतने उपदेश देने के बाद भी सुधार नहीं हो पा रहा. क्योंकि हम जड़ मूल तक नहीं पहुंच रहे. जड़ मूल है निर्दोष दृष्टि और कर्म का सिद्धांत. इससे आगे भी और गहराई है, जिसे समझने के लिए विस्तार से अध्ययन और श्रवण जरूरी है.

अगर सही समझ आ जाए, सम्यक दृष्टि मिल जाए, सम्यक ज्ञान मिल जाए, तो गलत अपने आप छूट जाएगा और सही अपने आप आ जाएगा. यही निर्दोष दृष्टि का रहस्य है. यही कारण है कि लोग जीवन भर सुनते रहते हैं, लेकिन जब तक निर्दोष दृष्टि नहीं मिलती, तब तक वास्तविक परिवर्तन नहीं आता.

इसलिए जो भी इस बात को समझे, वह इसे आगे पहुंचाए, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग निर्दोष दृष्टि को समझ सकें और अपने जीवन में उतार सकें.

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