अशोक डी. कोठारी
हमारे जीवन में बार-बार रुकावटें क्यों आती हैं? हम मेहनत करते हैं, प्रयास करते हैं, फिर भी काम अटक जाता है. इसका कारण क्या है?
इसका कारण बहुत स्पष्ट है. हमने कभी न कभी, इस भव में या पूर्व भव में, किसी न किसी के जीवन में, उसके कार्य में, उसके आगे बढ़ने के मार्ग में रुकावटें डाली हैं. किसी को रोकने का प्रयास किया है. किसी के मार्ग में कांटे बिछाए हैं. ईर्ष्या और जलन के भाव रखे हैं. यही अंतराय कर्म बनकर आज हमारे जीवन में रुकावट बनकर सामने आता है.
अंतराय कर्म का उदय
अब एक साधारण उदाहरण समझिए. कोई व्याख्यान चल रहा है. महाराज साहब प्रवचन दे रहे हैं. कहीं भागवत कथा चल रही है, कहीं रामायण, कहीं शिव पुराण, कहीं कोई धर्म चर्चा. सैकड़ों-हजारों लोग सुनने बैठे हैं.
कुछ लोग ध्यान से सुनते हैं, लेकिन बहुत से लोग ऐसे होते हैं जिन्हें झपकी आने लगती है. नींद आने लगती है. जैसे ही धर्म और ज्ञान की बातें शुरू होती हैं, आंखें भारी हो जाती हैं. वे जोर-जोर से खर्राटे लेने लगते हैं. आसपास बैठे लोगों को परेशानी होती है.
यह कोई जानबूझकर नहीं कर रहा. असल में यह अंतराय कर्म का उदय है. जो ज्ञान मंच से दिया जा रहा है, उसे वह व्यक्ति ग्रहण नहीं कर पा रहा. भाव मन में है कि सुनूं, समझूं, लेकिन शरीर सुस्ती और नींद में चला जाता है.
ऐसे में उपाय क्या है.? ऐसे व्यक्ति को थोड़ी देर खड़े हो जाना चाहिए. शरीर को हिलाना-डुलाना चाहिए. संभव हो तो 10-15 मिनट वज्रासन या पद्मासन में बैठना चाहिए. कभी-कभी खड़े-खड़े सुनना चाहिए. इससे नींद का अंतराय धीरे-धीरे कम होता है.
इसी तरह जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी ऐसा होता है. गृहस्थी हो, बिज़नेस हो, नौकरी हो, सामाजिक कार्य हो या धार्मिक कार्य — हम कहते हैं कि हमने बहुत मेहनत की, फिर भी रुकावट आ गई. इसके पीछे कारण यही है कि हमने कभी दूसरों के काम में रुकावट डाली है. जानबूझकर या अनजाने में.
बहुत लोग ईर्ष्या और जलन के कारण ऐसा करते हैं. मन में आता है — “मेरे से आगे न बढ़ जाए.” लेकिन सच्चाई यह है कि जिसकी पुण्य प्रबल है, जिसका प्रारब्ध मजबूत है, वह आगे बढ़ेगा ही. आप चाहकर भी उसे रोक नहीं सकते.
और यदि किसी का प्रारब्ध कमजोर है, पाप का उदय है, तो वह अपने आप रुक जाएगा. उस समय आपकी रुकावट सिर्फ एक निमित्त बनती है. मूल कारण तो उसका प्रारब्ध ही होता है.
इसलिए ईर्ष्या और जलन करने का कोई कारण नहीं है. जिसके भाग्य में जो लिखा है, वही उसे मिलेगा. आपके जलने से न उसका कम होगा, न आपको कुछ मिलेगा.
यदि आज आपको नहीं मिला, तो इसका अर्थ है कि अभी आपके प्रारब्ध में नहीं है. जब होगा, तब मिलेगा. यह व्यवस्था बिल्कुल स्पष्ट और न्यायपूर्ण है.
एक छोटा सा उदाहरण
एक छोटा सा उदाहरण समझिए. किसी का पैर 10 नंबर का है, इसलिए वह 10 नंबर का जूता पहनता है. आपका पैर 7 नंबर का है. अगर आप 10 नंबर का जूता पहनने की ज़िद करेंगे, तो आप चल भी नहीं पाएंगे. उसी तरह, किसी के पास बड़ी गाड़ी, बड़ा बंगला, ज्यादा पैसा है क्योंकि उसका पुण्य बड़ा है. आपका पुण्य उस स्तर का नहीं है, इसलिए आपको वैसा नहीं मिला.
जब पुण्य होगा, तब सब अपने आप मिलेगा. नहीं होगा, तो कितनी भी मेहनत कर लो, योग नहीं बैठेगा. शास्त्रों में कहा गया है — पुण्य के बिना भली वस्तु का योग नहीं होता.
इसी कारण बहुत से लोग बहुत मेहनत करते हैं, फिर भी एक सीमा से आगे नहीं बढ़ पाते. कारण यही है — प्रारब्ध का अभाव.
अंतराय कर्म सिर्फ धन या सफलता में ही नहीं, ज्ञान लेने में भी रुकावट बनता है. घर में कोई शास्त्र की बात शुरू करे, कोई अच्छी बात कहे, तो कुछ लोगों को तुरंत नींद आने लगती है. यह ज्ञान का अंतराय है, दर्शन का अंतराय है, सही समझ का अंतराय है.
यह सब इसलिए होता है क्योंकि हमने कभी किसी के ज्ञान लेने में रुकावट डाली थी.
जीवन में रुकावटें न आने के लिये क्या करें?
अब यदि आप चाहते हैं कि आपके जीवन में रुकावटें न आएं, तो उपाय बहुत सरल है — किसी के जीवन में, किसी भी विषय में, किसी भी कार्य में रुकावट मत डालिए.
ईर्ष्या मत कीजिए. जलन मत कीजिए. सहज और सरल रहिए. जहां संभव हो, दूसरों की मदद कीजिए.
भाव रखें — सब आगे बढ़ें, सब सुखी हों, सबका मंगल हो, सबका कल्याण हो.
जैसे आपके भाव होंगे, वैसे ही कर्म बनेंगे और वैसी ही प्रतिक्रिया आएगी.
एक और बहुत महत्वपूर्ण बात — अपने जीवन को पूरी तरह पॉजिटिव बनाइए. नेगेटिविटी को आते ही रोक दीजिए.
नेगेटिव विचार न करें, नेगेटिव बात न बोलें, नेगेटिव न देखें, नेगेटिव कर्म न करें. अगर नेगेटिव विचार आ भी जाए, तो उसे तुरंत पॉजिटिव में बदल दीजिए.
अगर याद नहीं रहता, तो एक उपाय कीजिए. जहां-जहां आपकी नजर जाती है — घर, ऑफिस, दुकान, फैक्ट्री — वहां “P” या “Positive” लिख दीजिए. बार-बार देखने से आदत बन जाएगी.
एक और नियम — जहां तक हो सके “NO” मत बोलिए. “हां”, “Yes” जैसे पॉजिटिव शब्दों का प्रयोग कीजिए.
अगर कभी “नहीं” निकल भी जाए, तो उसे तुरंत पॉजिटिव में बदल दीजिए — “जो मेरे जीवन में व्यवस्थित है, वह मुझे स्वीकार है.”
यह छोटी-छोटी बातें अंतराय कर्म को बहुत कम कर देती हैं.
अंतराय कर्म बहुत बड़ा कर्म है. इसी के कारण हम आगे नहीं बढ़ पाते. इसी के कारण आत्मा निर्मल नहीं हो पाती. हम यह भावना रखें कि हमारे अंतराय कर्म शीघ्र नष्ट हों. और हम किसी और के जीवन में कभी अंतराय न बनें.
बस सीधी-सी बात है — अच्छी भावना रखें, ईर्ष्या-जलन छोड़ें, पॉजिटिव रहें. तो इस भव में भी और अगले भव में भी अंतराय नहीं आएंगे. आप अपने हर क्षेत्र में आगे बढ़ पाएंगे.
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