संत समाज और वाणी संयम: आस्था, मर्यादा और ज़िम्मेदारी का सवाल

डॉ. शिवसेन जैन संघर्ष

एक सभ्य और अच्छे समाज को बनाने में संत परंपरा का बहुत बड़ा योगदान रहा है. संतों ने अपनी ज़िंदगी और अपनी बातों से लोगों को सच, प्यार, करुणा और मिलजुल कर रहने का रास्ता दिखाया है. संत की सबसे बड़ी पहचान उसकी संयमित वाणी होती है. वह कम बोलता है, सोचकर बोलता है और ऐसा बोलता है जिससे किसी को ठेस न पहुंचे. उसकी वाणी ही उसकी असली ताकत होती है.

लेकिन आज के समय में एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि संत समाज का एक हिस्सा इस रास्ते से भटकता हुआ दिखाई दे रहा है. खासकर सोशल मीडिया पर कुछ संत आपस में उलझते, एक-दूसरे पर आरोप लगाते और ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते नज़र आते हैं जो न तो मर्यादित होती है और न ही संत परंपरा के अनुरूप. यह केवल उनकी व्यक्तिगत छवि का नुकसान नहीं करता, बल्कि पूरे समाज की आस्था को भी कमजोर करता है. जब संत ही अपनी वाणी पर संयम नहीं रख पाते, तो आम आदमी किससे सीख ले.

एक अनाम कवि की ये पंक्तियां आज की इस हालत को बहुत गहराई से बयान करती हैं.

कहां तपस्या खंडित हो गई,
कहां आचरण हुआ हराम.
हम ने भगतसिंह बोये थे,
खेतों में उग आए सुखराम.

इन पंक्तियों का मतलब साफ है. जब जिनसे हम ऊंचे आदर्शों की उम्मीद करते हैं, उनके काम और बातें उन आदर्शों के उलट दिखने लगें, तो समाज के मन में निराशा और मोहभंग पैदा होता है. लोगों का भरोसा डगमगाने लगता है.

इस हालात के पीछे कुछ साफ कारण दिखाई देते हैं.

पहला कारण यह है कि संत समाज पर अब सत्ता, नाम, शोहरत और ज़्यादा अनुयायी बनाने का दबाव बढ़ गया है. आध्यात्मिक साधना की जगह जब प्रसिद्ध होने की होड़ लग जाती है, तो वाणी का संतुलन बिगड़ना स्वाभाविक है.

दूसरा कारण यह है कि आत्ममंथन और तपस्या की जगह दिखावे को ज़्यादा महत्व दिया जा रहा है. अंदर की साधना, मौन और संयम की बजाय मंच, कैमरा और लाइक-शेयर ज़्यादा अहम हो गए हैं. इसका सीधा असर शब्दों की गरिमा पर पड़ता है.

तीसरा कारण संवाद के नाम पर गुस्से में तुरंत प्रतिक्रिया देने की आदत है. सोशल मीडिया ने बोलने को आसान बना दिया है, लेकिन सोचने का समय छीन लिया है. बिना सोचे बोले गए शब्द विवाद बढ़ाते हैं और संत समाज की गरिमा को चोट पहुँचाते हैं.

इस स्थिति से निकलने के लिए कुछ ज़रूरी कदम उठाने होंगे.

सबसे पहले संत समाज को फिर से आत्ममंथन, संयम और अनुशासन की ओर लौटना होगा. संत की पहचान उसके तेज़ शब्दों से नहीं, बल्कि उसके संयम, मौन और संतुलित आचरण से होती है. वाणी पर नियंत्रण ही असली साधना है.

दूसरा, समाज को भी विवेकपूर्ण आस्था सीखनी होगी. अंधभक्ति की जगह सोच, सवाल और सत्य को महत्व देना ज़रूरी है. जब समाज जागरूक होता है, तभी संत समाज भी अपनी ज़िम्मेदारी को समझता है.

तीसरा, हमें स्वस्थ और मर्यादित संवाद की संस्कृति को बढ़ावा देना होगा. असहमति हो सकती है, लेकिन भाषा शालीन होनी चाहिए. शब्द जोड़ने का काम करें, तोड़ने का नहीं. तभी वाणी की मर्यादा और शब्दों की ताकत बनी रह सकती है.

आख़िर में यह समझना ज़रूरी है कि यह सवाल केवल संत समाज का नहीं है, बल्कि पूरे समाज का है. अगर संत अपनी वाणी और आचरण से संयम का उदाहरण पेश करेंगे, तो समाज अपने आप सही दिशा में आगे बढ़ेगा. यही संत परंपरा का असली उद्देश्य और समाज के लिए उसका सबसे बड़ा योगदान है.

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