सिंधिया वंश और जैन धर्म

महावीर सांगलीकर

jainway@gmail.com

सिंधिया कुल मराठा समाज का एक बहुत ही प्रसिद्ध और प्रभावशाली कुल रहा है. महाराष्ट्र में इस कुल को शिंदे कहा जाता है, जबकि उत्तर भारत में यही कुल सिंधिया नाम से जाना जाता है. इतिहासकारों के अनुसार, इस कुल का मूल नाम सिंद था, जो समय और क्षेत्र के अनुसार बदलता चला गया.

सिंधिया वंश का संबंध प्राचीन नागवंश से है. नागवंश का अर्थ है वह वंश या कुल, जो नाग या सर्प को अपना प्रतीक और संरक्षक मानता था. इसी कारण सिंधिया कुल के ध्वज और प्रतीकों में नाग का चिन्ह पाया जाता है. यह केवल एक प्रतीक नहीं था, बल्कि उनके धार्मिक और सांस्कृतिक विश्वासों से भी जुड़ा हुआ था.

धरणेन्द्र, पद्मावती और सिंधिया वंश

कुछ प्राचीन शिलालेखों और ताम्रपत्रों से यह जानकारी मिलती है कि सिंधिया कुल के पूर्वज अजानबाहु सिंद थे. अजानबाहु अहिच्छत्र के राजा धरणेंद्रके पुत्र थे. अजानबाहु ने एक कदम्ब राजकुमारी से विवाह किया. (कदम्ब दक्षिण भारत का एक प्रसिद्ध राजवंश था, और इसका संबंध भी जैन परंपरा से था). इस विवाह से उन्हें तीन पुत्र हुए, और इन्हीं तीन पुत्रों से आगे चलकर सिंद कुल की अलग-अलग शाखाएं बनीं.

राजा धरणेंद्र जैन धर्म के इतिहास में एक विशेष स्थान रखते हैं. वे जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ के समय के प्रसिद्ध राजा माने जाते हैं. भगवान पार्श्वनाथ स्वयं भी एक नागवंशी राजकुमार थे, जिन्होंने राजसी जीवन छोड़कर तप, संयम और अहिंसा का मार्ग अपनाया.

जैन परंपरा में एक प्रसिद्ध कथा मिलती है, जिसके अनुसार एक तपस्वी कमठ ने धरणेंद्र और उनकी पत्नी पद्मावती को भारी कष्ट दिया था. उस संकट के समय भगवान पार्श्वनाथ ने धरणेंद्र और पद्मावती की रक्षा की और उन्हें सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया. इस घटना से कमठ पार्श्वनाथ से अत्यंत क्रोधित हो गया.

बाद में जब भगवान पार्श्वनाथ स्वयं गहन तपस्या में लीन थे, तब कमठ ने उन्हें कष्ट देने का प्रयास किया. इस बार भूमिकाएं बदल गईं. अब धरणेंद्र और पद्मावती ने भगवान पार्श्वनाथ की रक्षा की. यही घटना जैन समाज में अत्यंत श्रद्धा और आस्था के साथ स्मरण की जाती है.

समय के साथ इस कथा को एक दैवी और पौराणिक रूप दे दिया गया. धरणेंद्र और पद्मावती को नाग देवता और नाग देवी के रूप में देखा जाने लगा. विशेष रूप से देवी पद्मावती को जैन समाज में एक शक्तिशाली और करुणामयी देवी माना जाता है. जैन महिलाएं आज भी पद्मावती देवी की विशेष श्रद्धा से पूजा करती हैं. देश के अधिकांश जैन मंदिरों में धरणेंद्र और पद्मावती की मूर्तियां देखने को मिलती हैं.

कोल्हापूर की अंबाबाई देवी

कोल्हापुर की प्रसिद्ध अंबाबाई या महालक्ष्मी देवी सिंधिया कुल की कुलदेवी थीं. कई विद्वानों का मानना है कि यह महालक्ष्मी देवी वास्तव में पद्मावती देवी का ही एक लोक रूप है. बाद के काल में इस मंदिर को औपचारिक रूप से महालक्ष्मी मंदिर कहा जाने लगा, लेकिन इसकी जड़ें सिंधिया कुल और जैन परंपरा से जुड़ी हुई मानी जाती हैं.

इतिहास में सिंधिया कुल की कई शाखाएं रही हैं, जिन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों में शासन किया. इनमें करहाटक (आज का कराड, दक्षिण महाराष्ट्र), जुन्नर (पुणे के पास), सिंदवाड़ी (बेल्लारी, कर्नाटक), एलबुर्गा (आंध्र प्रदेश) और चक्रकोट (वर्तमान बस्तर क्षेत्र) जैसे स्थान प्रमुख हैं. इन सभी क्षेत्रों में जैन संस्कृति और स्थापत्य के प्रमाण आज भी मिलते हैं.

कर्नाटक के बीजापुर ज़िले में बागलकोट के पास स्थित भैरनमट्टी नामक स्थान पर मिले एक शिलालेख में सिंद कुल की विस्तृत वंशावली दी गई है. यह वंशावली सिंद पुलिकल से शुरू होकर सेव्यरास तक जाती है और इसका काल 973 ईस्वी से 1076 ईस्वी के बीच का माना जाता है. यह शिलालेख सिंद कुल के इतिहास को समझने का एक महत्वपूर्ण स्रोत है.

कर्नाटक और महाराष्ट्र में पाए गए अनेक शिलालेख और स्मारक यह स्पष्ट करते हैं कि सिंद कुल का जैन धर्म के प्रति गहरा सम्मान और लगाव रहा है. उन्होंने न केवल जैन साधुओं को संरक्षण दिया, बल्कि जैन मंदिरों, प्रतिमाओं और तीर्थों के विकास में भी योगदान दिया.

नेमाजी शिंदे

छत्रपति शिवाजी महाराज के समय नेमाजी शिंदे नाम के एक पराक्रमी मराठा सरदार थे. महाराणी ताराबाई के समय नेमाजी शिंदे और उनके सैनिकों ने मुगलों पर आक्रमण कर के उन्हें पराभूत किया था.

नेमाजी यह नाम नेमि का अपभ्रंश लगता है. नेमाजी ने लिखे हुए एक पत्र में ‘वीतराग’ यह शब्द आता है. यह बात दर्शाती है की नेमजी शिंदे जैन थे, या उनपर जैन धर्म का प्रभाव था. इसपर अधिक शोधकार्य की आवश्यकता है.

ग्वालियर के सिंधिया और जैन धर्म

यह संबंध केवल इतिहास तक सीमित नहीं है, बल्कि आज भी जारी है. प्रसिद्ध जैन संत अद्भुत बाबा ग्वालियर के सिंधिया राजघराने से थे. यह तथ्य दर्शाता है कि राजसी जीवन होते हुए भी जैन वैराग्य और त्याग की परंपरा सिंधिया कुल में जीवित रही है.

स्वर्गीय माधवराव सिंधिया के पुत्र और वर्तमान सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सार्वजनिक रूप से कई बार कहा है और कहते रहते है कि वे जैन सिद्धांतों में विश्वास रखते हैं और उनका पालन करते हैं. इसी प्रकार यशोधरा राजे सिंधिया, जो माधवराव सिंधिया की बहन हैं, उन्होंने जैन साध्वी बनने की इच्छा व्यक्त की थी, जो इस परंपरा की निरंतरता को दर्शाता है.

एक विशेष बात यह है कि ग्वालियर के किले में, जहां से सिंधिया कुल ने राज किया, विशाल जैन शिलामूर्तियां और एक अत्यंत सुंदर जैन मंदिर मौजूद हैं. यह मूर्तियां और मंदिर तोमर राजवंश के दौरान स्थापित हुए थे.

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