वीरवाल जैन समाज : एक प्रेरणादायक सामाजिक और धार्मिक परिवर्तन

डॉ. पंकज जैन (ग्वालियर)

वीरवाल जैन समाज मुख्य रूप से राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र (उदयपुर, चित्तौड़गढ़ और आसपास के इलाके) में निवास करने वाला एक विशिष्ट जैन समुदाय है. यह समाज राजस्थान की अन्य पारंपरिक जैन जातियों जैसे ओसवाल, पोरवाल, खंडेलवाल आदि से अलग पहचान रखता है. इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी जैन परंपरा अपेक्षाकृत नई है और यह 20वीं सदी के मध्य में हुए एक बड़े धर्म परिवर्तन का उदाहरण है.

मूल और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

वीरवाल समाज के लोग मूल रूप से खटीक जाति से संबंधित थे. खटीक जाति भारत के कई राज्यों, जिनमें राजस्थान भी शामिल है, में अनुसूचित जाति (Scheduled Caste) के अंतर्गत आती है.

पारंपरिक रूप से यह समाज मांस व्यापार, कसाई का काम, शिकार और चमड़े से जुड़े व्यवसायों से जुड़ा रहा है.
खटीक शब्द संस्कृत के खट्टिक या खटिका से निकला माना जाता है, जिसका अर्थ होता है शिकारी या बलि देने वाला.

मेवाड़ क्षेत्र में इतिहास के दौरान कई जातियां जैन धर्म से प्रभावित होती रही हैं, लेकिन वीरवाल समाज का जैन धर्म में प्रवेश आधुनिक काल की एक महत्वपूर्ण घटना है.

जैन धर्म की ओर

लगभग 1950 के आसपास (कुछ स्रोत 1958 का भी उल्लेख करते हैं), स्थानकवासी जैन मुनि समीर मुनीजी महाराज ने उदयपुर और मेवाड़ क्षेत्र में खटीक समुदाय से संपर्क किया. मुनीजी महाराज के सरल, प्रभावशाली और करुणा से भरे उपदेशों से हजारों लोग गहराई से प्रभावित हुए. उन्होंने अहिंसा को जीवन का आधार बनाया. मांसाहार का पूर्ण त्याग किया और शुद्ध शाकाहार अपनाया. अपरिग्रह, सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चारित्र जैसे जैन मूल सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारा.

समीर मुनीजी

वीरवाल नाम का अर्थ और महत्व

समीर मुनीजी महाराज ने इस नव-जैन समुदाय को वीरवाल नाम दिया. इस नाम का अर्थ है भगवान महावीर से जुड़ा हुआ या वीरों का समूह. यह नाम इस समाज की साहसिक सोच, दृढ़ निश्चय और पुराने जीवन को छोड़कर अहिंसा का मार्ग अपनाने की वीरता को दर्शाता है.

यह परिवर्तन जैन इतिहास में एक प्रेरणादायक उदाहरण माना जाता है, क्योंकि एक सामाजिक रूप से पिछड़ी पृष्ठभूमि वाला पूरा समुदाय एक साथ जैन बनकर नई पहचान स्थापित करता है.

प्रमुख ऐतिहासिक स्थल और संस्थाएं

समीर पवन धाम

समीर पवन धाम वीरवाल समाज का प्रमुख धार्मिक केंद्र है. यह अहिंसा नगर में स्थित है, जो चित्तौड़गढ़ से लगभग 4 मील दूर है. इस धाम का उद्घाटन 1966 में राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया द्वारा किया गया था.

समीर मुनीजी स्थानकवासी परंपरा से थे, इसलिए वीरवाल समाज मुख्य रूप से मूर्ति पूजा रहित, स्थानक आधारित स्थानकवासी जैन परंपरा का पालन करता है. हालांकि, इस धाम में दिगंबर, श्वेतांबर मूर्तिपूजक, और अन्य जैन परंपराओं के साधु-संतों का भी सम्मानपूर्वक स्वागत किया जाता है.

समाधि दिवस और संगठन

समीर मुनीजी महाराज का समाधि दिवस हर वर्ष ऑल इंडिया जैन वीरवाल जैन संघ द्वारा श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है. यह आयोजन समाज को जोड़ने, नई पीढ़ी को इतिहास से परिचित कराने, और जैन मूल्यों को मजबूत करने का महत्वपूर्ण अवसर होता है.

आज वीरवाल समाज पूरी तरह जैन जीवनशैली का पालन करता है. सख्त शाकाहार, अहिंसा का कड़ाई से पालन, पर्युषण, दश लक्षण जैसे पर्वों का सामूहिक आयोजन समाज की पहचान बन चुके हैं. अब समाज के लोग व्यापार, शिक्षा, सेवा क्षेत्र और अन्य आधुनिक व्यवसायों में सक्रिय हैं और सामाजिक व धार्मिक रूप से अच्छी तरह संगठित हैं.

ऑल इंडिया जैन वीरवाल जैन संघ समाज की प्रमुख संस्था है, जो धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का संचालन करती है.

वीरवाल जैन समाज अहिंसा और जैन सिद्धांतों की शक्ति का जीवंत प्रमाण है. यह दिखाता है कि एक संत का सच्चा प्रयास, सही मार्गदर्शन और दृढ़ संकल्प किस तरह पूरे समुदाय की दिशा बदल सकता है.

यह जैन इतिहास में सबसे हाल का और सबसे प्रेरणादायक धर्म परिवर्तन माना जाता है, जो आज भी समाज के लिए प्रेरणा स्रोत है.

वीरवाल समाज से दीक्षित जैन साध्वी श्री दीक्षित जी महाराज
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